व्हाइट हाउस में ट्रंप के बॉलरूम प्रोजेक्ट पर अदालत ने लगाई रोक, कहा- राष्ट्रपति अस्थायी निवासी हैं
अमेरिका की एक संघीय अपीलीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को व्हाइट हाउस में 40 करोड़ डॉलर की लागत से बनने वाले एक विशाल बॉलरूम का निर्माण रोकने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में…
अमेरिका की एक संघीय अपीलीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को व्हाइट हाउस में 40 करोड़ डॉलर की लागत से बनने वाले एक विशाल बॉलरूम का निर्माण रोकने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति व्हाइट हाउस का स्थायी मालिक नहीं, बल्कि एक अस्थायी निवासी होता है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया सर्किट के लिए अमेरिकी फेडरल अपील्स कोर्ट ने यह फैसला 2-1 के बहुमत से सुनाया। अदालत ने प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अवसर देने के लिए अपने इस आदेश पर 14 दिनों की अस्थायी रोक भी लगाई है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा, "राष्ट्रपति के पास इस संपत्ति पर कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। यह परिसर वर्तमान और भविष्य के सभी राष्ट्रपतियों तथा अमेरिकी जनता के उपयोग के लिए बनाया और संरक्षित किया गया है।" फैसले में इस बात पर भी जोर दिया गया कि अमेरिकी इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जहां किसी राष्ट्रपति ने निजी तौर पर जुटाए गए धन से व्हाइट हाउस के महत्वपूर्ण हिस्सों को एकतरफा गिरा दिया हो, जिन्हें कांग्रेस ने मंजूरी दी थी और जिसका भुगतान करदाताओं ने किया था।
क्या है पूरा मामला?
यह फैसला नेशनल ट्रस्ट फॉर हिस्टोरिक प्रिजर्वेशन के पक्ष में आया है। याचिका में कहा गया था कि अक्टूबर 2025 में सिर्फ तीन दिनों के भीतर, ट्रंप प्रशासन ने बिना किसी विचार-विमर्श या कांग्रेस की अनुमति के व्हाइट हाउस के ईस्ट विंग को पूरी तरह से ध्वस्त करा दिया था। इस जगह पर 90,000 वर्ग फुट का एक विशाल बॉलरूम बनाने की योजना थी। यह पूरी परियोजना निजी फंड से वित्तपोषित थी और इस पर कांग्रेस की कोई निगरानी नहीं थी।
ट्रंप प्रशासन का तर्क
इससे पहले जुलाई में राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस के पुनर्निर्माण को अमेरिका के व्यापक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया था। 7 जुलाई को रोज गार्डन से अपने एक संबोधन में उन्होंने कहा था कि देश की सबसे प्रतिष्ठित इमारत को राष्ट्रीय शक्ति, इतिहास और आत्मविश्वास का प्रदर्शन करना चाहिए। उनका तर्क था कि अमेरिका के पास दुनिया की अन्य बड़ी शक्तियों के बराबर या उनसे बेहतर औपचारिक सुविधाएं होनी चाहिए।
इनपुट: IANS



