पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के नए रक्षा समझौते से भारत के सामने क्या हैं रणनीतिक चुनौतियाँ?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मिलकर एक नया रक्षा समझौता किया है, जिसे 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' नाम दिया गया है। इस समझौते ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति के साथ-साथ भारत के लिए भी नई रणनीतिक…
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने मिलकर एक नया रक्षा समझौता किया है, जिसे 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' नाम दिया गया है। इस समझौते ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति के साथ-साथ भारत के लिए भी नई रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते की सबसे अहम शर्त यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों पर हमला माना जाएगा।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में रणनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की संभावित सैन्य कार्रवाई और खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा व जल ढाँचे की सुरक्षा जैसी बढ़ती चिंताएँ इस समझौते का मुख्य कारण हैं। इसका उद्देश्य अस्थिर क्षेत्र में सामूहिक सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना है।
भारत के लिए चिंता और सवाल
इस समझौते ने भारत के सामने कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर भविष्य में किसी बड़े सीमा-पार आतंकी हमले के जवाब में भारत को पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई करनी पड़ती है, तो इस समझौते की पारस्परिक रक्षा वाली धारा की व्याख्या कैसे की जाएगी।
भारत हमेशा से यह स्पष्ट करता रहा है कि आत्मरक्षा में की जाने वाली आतंकवाद-रोधी कार्रवाई किसी संप्रभु देश पर हमले से अलग है। हालांकि, विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी स्थिति में यह रक्षा प्रावधान लागू होगा या नहीं, यह उस समय की परिस्थितियों, राजनयिक विमर्श और तीनों हस्ताक्षरकर्ता देशों की व्याख्या पर निर्भर करेगा।
बढ़ता रक्षा सहयोग और भारत का पक्ष
विश्लेषकों का कहना है कि तुर्की लगातार पाकिस्तान के साथ अपना रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, जबकि सऊदी अरब के विशाल वित्तीय संसाधन अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को मजबूत कर सकते हैं। एक विशेषज्ञ ने कहा, "इन घटनाक्रमों पर नई दिल्ली को स्वाभाविक रूप से करीब से नजर रखनी चाहिए।"
दूसरी तरफ, भारत और सऊदी अरब के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश और आतंकवाद-विरोध जैसे क्षेत्रों में मजबूत रणनीतिक संबंध हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि रियाद को यह साफ करना चाहिए कि यह समझौता भारत के खिलाफ नहीं है और इससे आतंकवाद के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता कमजोर नहीं होगी। विशेषज्ञों की राय है कि भारत को घबराने या लापरवाह होने के बजाय सतर्क कूटनीति और क्षेत्रीय साझेदारों से निरंतर संवाद बनाए रखना चाहिए।
इनपुट: IANS



