UNGA: दुनिया के नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दोहरे मापदंड पर उठाए सवाल, कहा – 'सब पर हो एक समान लागू'
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक में दुनिया भर के कई नेताओं ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू किया जा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक में दुनिया भर के कई नेताओं ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू किया जा रहा है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न राष्ट्रों के प्रमुखों ने चेतावनी दी कि इस तरह के दोहरे मापदंड से वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है और युद्ध रोकने वाली संस्थाओं पर से भरोसा घट रहा है।
कई देशों का मानना है कि जब अंतरराष्ट्रीय नियम कुछ देशों पर सख्ती से लागू किए जाते हैं, लेकिन शक्तिशाली देशों या उनके सहयोगियों के मामले में उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है, तो ऐसे नियम अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं।
न्याय या 'जंगल का कानून'
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक अहम सवाल उठाते हुए कहा कि दुनिया को अंतरराष्ट्रीय न्याय और एक ऐसी व्यवस्था के बीच चुनाव करना होगा, "जहां सिर्फ ताकत ही मायने रखती है"। उन्होंने स्पष्ट किया, "न्याय के बिना शांति नहीं हो सकती।" मैक्रों ने पूछा कि क्या दुनिया एक सभ्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहती है या फिर 'जंगल के कानून' की ओर वापस लौटना चाहती है।
इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा जैसे संकट गंभीर हैं, लेकिन "बहुपक्षीय व्यवस्था का कमजोर होना संभवतः सबसे ज्यादा चिंता की बात है।"
फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष का संदर्भ
बैठक में कई नेताओं ने फिलिस्तीन और इजरायल के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कानून के दोहरे रवैये के उदाहरण के तौर पर पेश किया। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने कहा कि जब तक फिलिस्तीन के मुद्दे को नजरअंदाज किया जाएगा, तब तक एक न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संभव नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा, "कानून सभी पर बराबर लागू होना चाहिए।"
जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास प्रतिबंध लगाने और कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने जैसे कई तरीके हैं, लेकिन इजरायल की कार्रवाइयों के मामले में इनका एक समान इस्तेमाल नहीं किया गया। उन्होंने कहा, "प्रस्ताव वहीं खत्म हो जाते हैं, जहां से शुरू होते हैं, यानी कागज पर।" वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि 7 अक्टूबर को हमास के हमले और ईरान से पैदा हुए खतरों के जवाब में उनकी सैन्य कार्रवाइयां जरूरी थीं।
जवाबदेही और सुधार की मांग
अलग-अलग संघर्षों पर दुनिया की अलग-अलग प्रतिक्रिया को लेकर भी चिंता जताई गई। घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने चेतावनी दी कि दुनिया "एकतरफा फैसलों, कानून की अनदेखी और बहुपक्षीय नियमों के कमजोर होने की खतरनाक दिशा" में बढ़ रही है।
इस बीच, स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री जनेज जान्शा ने एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा जो यह तुलना करे कि दुनिया ने विभिन्न संकटों पर किस तरह की कूटनीतिक, मानवीय और कानूनी प्रतिक्रिया दी। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन ने भी इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध किया और मध्यम शक्ति वाले देशों से अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की व्यवस्था को बचाने की अपील की। भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र चार्टर और देशों की संप्रभुता के सम्मान का समर्थन करते हुए कहा है कि वैश्विक संस्थाओं में सभी क्षेत्रों का सही प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
इनपुट: IANS



