ईरान के तेल ठिकानों पर हमला क्यों नहीं किया? डोनाल्ड ट्रंप ने बताई वजह, ज़मीनी कार्रवाई से भी नहीं किया इनकार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया है कि उन्होंने सेना को ईरान के महत्वपूर्ण खार्ग द्वीप पर हमले के दौरान तेल ठिकानों को निशाना न बनाने का निर्देश दिया था। उन्होंने इसकी वजह वैश्विक अर
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुलासा किया है कि उन्होंने सेना को ईरान के महत्वपूर्ण खार्ग द्वीप पर हमले के दौरान तेल ठिकानों को निशाना न बनाने का निर्देश दिया था। उन्होंने इसकी वजह वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर को बताया। हालांकि, समाचार एजेंसी IANS के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने भविष्य में ईरान के खिलाफ ज़मीनी सैन्य अभियान की संभावना को खारिज नहीं किया है।
फॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका ने खार्ग द्वीप पर दो या तीन बार हमले किए, लेकिन तेल ठिकानों को जानबूझकर बख्श दिया गया। उन्होंने कहा, "मैंने सेना को निर्देश दिया था कि तेल ठिकानों को नुकसान न पहुंचाया जाए, क्योंकि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।"
सैन्य अभियान और भविष्य की रणनीति
ईरान के खिलाफ संभावित ज़मीनी सैन्य कार्रवाई के सवाल पर ट्रंप ने कहा कि वह इस विकल्प से इनकार नहीं कर रहे हैं। उनके मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में ऐसे अभियान की आवश्यकता पड़ सकती है। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका खार्ग द्वीप पर नियंत्रण करने की योजना बना रहा है, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि अगर ईरान की सैन्य क्षमता पर्याप्त रूप से कमज़ोर हो जाती है, तो इस पर विचार किया जा सकता है।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी सैन्य अभियानों ने ईरान के सैन्य ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा कि अगर अभियान आज रोक भी दिया जाए, तो ईरान को इसे फिर से बनाने में लगभग 20 साल लग सकते हैं। ट्रंप के अनुसार, ईरान के खिलाफ अमेरिकी हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक वह स्वयं उन्हें रोकने का फैसला नहीं करते। उन्होंने कहा, "ईरान के साथ बातचीत केवल ताकत के आधार पर ही संभव है और सैन्य शक्ति ही वास्तविक ताकत है।"
खार्ग द्वीप का सामरिक महत्व
फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग द्वीप ईरान के कच्चे तेल के निर्यात का एक प्रमुख केंद्र है। इस द्वीप पर किसी भी तरह की बाधा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है, जिसका असर भारत जैसे प्रमुख एशियाई आयातक देशों पर भी पड़ सकता है।
इनपुट: IANS



