त्रिपुरा: सरकारी नौकरियों में स्थायी निवास प्रमाण-पत्र (PRTC) की अनिवार्यता खत्म, विपक्ष ने फैसले पर उठाए सवाल
त्रिपुरा में सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव किया गया है, जिसके तहत अब स्थायी निवासी प्रमाण-पत्र (PRTC) की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार के इस फैसले ने एक…
त्रिपुरा में सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव किया गया है, जिसके तहत अब स्थायी निवासी प्रमाण-पत्र (PRTC) की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार के इस फैसले ने एक राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है, जिसमें विपक्षी दलों और कई आदिवासी संगठनों ने इसे स्थानीय युवाओं के हितों के खिलाफ बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के प्रवक्ता और राज्य के पर्यटन मंत्री सुशांत चौधरी ने इस बदलाव की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि अब सरकारी नौकरी के आवेदकों को PRTC की जगह यह साबित करना होगा कि उन्होंने राज्य के किसी भी स्कूल में लगातार पांच साल तक पढ़ाई की है।
फैसले का आधार और विपक्ष की चिंताएं
मंत्री सुशांत चौधरी ने जानकारी दी कि यह निर्णय राज्य मंत्रिमंडल द्वारा त्रिपुरा उच्च न्यायालय के एक निर्देश के बाद लिया गया। दरअसल, दिल्ली के एक निवासी ने इस अनिवार्यता को लेकर याचिका दायर की थी, जिस पर अदालत ने सरकार को इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने को कहा था।
हालांकि, सीपीएम और कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। विपक्ष के नेता और सीपीएम के राज्य सचिव जितेंद्र चौधुरी ने आशंका जताई कि इस कदम से दूसरे राज्यों, विशेषकर भाजपा शासित पश्चिम बंगाल, असम और बिहार के उम्मीदवारों के लिए त्रिपुरा में सरकारी नौकरियों के रास्ते खुल जाएंगे। पूर्व मंत्री और लोकसभा सांसद रह चुके चौधुरी ने कहा, "पिछली वाम मोर्चा सरकार ने त्रिपुरा के नौकरी चाहने वालों के हितों की रक्षा के लिए पीआरटीसी शुरू किया था। लेकिन 2018 में भाजपा सरकार बनने के बाद पीआरटीसी के प्रावधानों को अनौपचारिक रूप से ढीला कर दिया गया और दूसरे राज्यों के लोगों को सरकारी नौकरियां दी गईं।"
अन्य राज्यों के नियमों से तुलना
विपक्षी नेताओं ने पड़ोसी राज्यों के सख्त नियमों का हवाला देते हुए त्रिपुरा सरकार के फैसले की आलोचना की है। कांग्रेस नेता और अधिवक्ता राखू दास ने कहा कि इस फैसले से भ्रष्टाचार बढ़ेगा, क्योंकि दूसरे राज्यों के लोग जाली स्कूल प्रमाण-पत्र बनवाकर नौकरियां हासिल कर सकते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि असम ने स्थानीय हितों की रक्षा के लिए NRC लागू किया है और कई पूर्वोत्तर राज्यों में इनर लाइन परमिट (ILP) की व्यवस्था है, लेकिन त्रिपुरा सरकार इसके विपरीत काम कर रही है।
एक अन्य कांग्रेस नेता ने अरुणाचल प्रदेश का उदाहरण दिया, जहां सरकारी नौकरी के लिए PRС, अरुणाचल प्रदेश अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र (APST) और स्थानीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य है। इसी तरह, असम में नौकरी के लिए तीन पीढ़ियों का निवास प्रमाण-पत्र देना होता है।
विभिन्न संगठनों ने भी उठाई आवाज
राजनीतिक दलों के अलावा, त्रिपुरा ट्राइबल एम्प्लॉइज एसोसिएशन और त्विप्रा स्टूडेंट्स फेडरेशन जैसे कई संगठनों ने भी इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। इन संगठनों का मानना है कि PRTC की अनिवार्यता स्थानीय युवाओं के हितों की रक्षा के लिए जरूरी थी और इसे हटाने से बाहरी प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी, जो राज्य के बेरोजगारों के लिए नुकसानदायक होगा।
इनपुट: IANS



