शनिवार, 25 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
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कावेरी डेल्टा में धान की खेती पर संकट: घटता भूजल, बढ़ता खारापन और मेट्टूर बांध से पानी का इंतज़ार

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में कुरुवई धान की फसल पर एक साथ कई संकट मंडरा रहे हैं। किसान भूजल के घटते स्तर, पानी में बढ़ते खारेपन और मेट्टूर बांध से पानी न छोड़े जाने की तिहरी चुनौती से जूझ रहे…

कावेरी डेल्टा में धान की खेती पर संकट: घटता भूजल, बढ़ता खारापन और मेट्टूर बांध से पानी का इंतज़ार
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में कुरुवई धान की फसल पर एक साथ कई संकट मंडरा रहे हैं। किसान भूजल के घटते स्तर, पानी में बढ़ते खारेपन और मेट्टूर बांध से पानी न छोड़े जाने की तिहरी चुनौती से जूझ रहे हैं, जिससे उनकी खड़ी फसल खतरे में पड़ गई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, भीषण गर्मी और कृषि पंपों के लिए मुफ्त बिजली की आपूर्ति में कटौती ने किसानों की समस्याओं को और गंभीर बना दिया है।

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तंजावुर जिले के पापनासम और तिरुवैयारु जैसे इलाकों में किसान इस सीजन में लगभग पूरी तरह से भूजल पर निर्भर हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अकेले तंजावुर में ही करीब एक लाख एकड़ में कुरुवई धान की खेती भूजल के सहारे की गई है। आम तौर पर, किसान शुरुआती सिंचाई के लिए भूजल का इस्तेमाल करते हैं और बाद में फसल के लिए मेट्टूर बांध से छोड़े गए कावेरी नदी के पानी पर निर्भर हो जाते हैं।

पानी की कमी और बिजली कटौती की दोहरी मार

इस साल जलाशय में पर्याप्त पानी न होने के कारण, हर साल 12 जून को छोड़े जाने वाला पानी अब तक जारी नहीं किया गया है। इसके चलते किसानों को पूरी तरह भूजल पर निर्भर रहना पड़ रहा है। लगातार पानी न बहने से भूजल का स्तर भी गिर रहा है। किसानों की चिंता तब और बढ़ गई जब बुधवार को टैन्जेडको (Tangedco) ने सूचित किया कि कृषि पंपों के लिए मुफ्त बिजली की आपूर्ति 18 घंटे से घटाकर 14 घंटे प्रतिदिन कर दी जाएगी।

पापनासम के एक किसान आर. अरुलसामी ने बताया, "भीषण गर्मी के कारण खेतों से पानी तेजी से वाष्पित हो रहा है, जबकि पिछले छह महीने से अधिक समय से कावेरी में पानी का प्रवाह नहीं हुआ है। भूजल स्तर हर दिन नीचे जा रहा है।"

बढ़ता खारापन और भविष्य की चिंता

एक और गंभीर समस्या वेल्लम पेरम्बुर, थेन पेरम्बुर, और अल्लूर अजीसिकुडी जैसे गांवों में भूजल के बढ़ते खारेपन की है। किसानों का कहना है कि पहले बांध से समय पर पानी छोड़े जाने से नहरों के माध्यम से भूजल रिचार्ज होता था, जिससे खारापन कम हो जाता था। इस बार ऐसा न होने से खारा पानी सिंचाई और फसल के स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर रहा है।

हालांकि किसान 3 अगस्त को आदि पेरुक्कु पर्व से पहले बांध से कुछ पानी छोड़े जाने की अपील कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे मुश्किल मानते हैं। सीनियर एग्रो टेक्नोलॉजिस्ट फोरम के पी. कलैवानन के अनुसार, मेट्टूर जलाशय में उसकी 93.47 टीएमसी फीट की कुल क्षमता के मुकाबले केवल 35 टीएमसी फीट पानी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा जल भंडारण को देखते हुए सितंबर से पहले पानी छोड़े जाने की संभावना नहीं है।

इनपुट: IANS

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News4Social नेशनल डेस्क

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