तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई: पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावे के लिए चुनाव आयोग पहुँचा बागी गुट
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा विवाद अब पार्टी के अस्तित्व से जुड़े एक अहम मोड़ पर पहुँच गया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के बागी गुट न
पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहा विवाद अब पार्टी के अस्तित्व से जुड़े एक अहम मोड़ पर पहुँच गया है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी के बागी गुट ने ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने के बाद अब पार्टी के चुनाव चिह्न 'दो फूल' और फंड पर भी अपना दावा ठोक दिया है। इसी सिलसिले में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 10 बागी विधायक गुरुवार को दिल्ली में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की पूर्ण पीठ से मुलाकात करेंगे।
बागी विधायकों का यह दल बुधवार शाम को ही कोलकाता से दिल्ली के लिए रवाना हो गया था। ऋतब्रत बनर्जी ने पुष्टि की है कि चुनाव आयोग ने उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए गुरुवार को सुनवाई का समय दिया है, जहाँ वे अपने पक्ष में कानूनी और राजनीतिक दलीलें पेश करेंगे।
बागी गुट का दावा और संख्या बल
बागी गुट का मुख्य आधार विधानसभा में विधायकों की संख्या है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 80 विधायक हैं। बागी खेमे का दावा है कि इनमें से 60 विधायक उनके साथ हैं, जबकि केवल 20 विधायक ही ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ हैं।
इसी संख्या बल के आधार पर बागी गुट चुनाव चिह्न पर अपना अधिकार जता रहा है। उनका तर्क 1968 के चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश पर आधारित है। इसके तहत किसी क्षेत्रीय दल को अपना चिह्न बरकरार रखने के लिए राज्य में कुल वैध मतों का कम से कम 6% वोट और कम से कम दो विधायक होना अनिवार्य है। बागियों का गणित है कि अगर एक विधायक को औसतन 80 हजार वोट भी मिलें, तो 60 विधायकों के हिसाब से उनके पक्ष में 48 लाख वोट होते हैं, जो 6% की सीमा से कहीं ज़्यादा है। वहीं, उनका दावा है कि ममता बनर्जी खेमे के 20 विधायक 37.80 लाख वोटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाते।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला 22 जून को तब गरमाया, जब बागी विधायकों ने पार्टी की एक नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति का गठन कर दिया। 30 सदस्यों वाली इस समिति ने ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर उनकी जगह वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। इसके अलावा 10 सदस्यों की एक उप-समिति भी बनाई गई। बागी गुट की ओर से वकीलों की एक टीम पहले ही इस फैसले से जुड़े सभी प्रस्ताव और कानूनी दस्तावेज़ चुनाव आयोग को सौंप चुकी है। गुरुवार की बैठक इन्हीं दस्तावेजों पर आधारित होगी।
इनपुट: IANS



