कोरियाई युद्ध के 70 साल बाद: अमेरिका और दक्षिण कोरिया मिलकर समुद्र में खोज रहे अपने लापता सैनिकों के सुराग
1950-53 के कोरियाई युद्ध के दौरान लापता हुए अमेरिकी सैनिकों के अवशेषों को खोजने के लिए दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने एक महत्वाकांक्षी संयुक्त अभियान शुरू किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह…
1950-53 के कोरियाई युद्ध के दौरान लापता हुए अमेरिकी सैनिकों के अवशेषों को खोजने के लिए दक्षिण कोरिया और अमेरिका ने एक महत्वाकांक्षी संयुक्त अभियान शुरू किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह अंडरवॉटर सर्वे प्रोजेक्ट दक्षिण कोरिया के पूर्वी तट पर सोमवार को शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य दशकों पहले दुर्घटनाग्रस्त हुए अमेरिकी सैन्य विमानों का मलबा और अवशेष ढूंढना है।
यह खोज अभियान 28 अगस्त तक चलेगा और गैंगवोन प्रांत के गंगनेउंग और यांगयांग के तटीय इलाकों में केंद्रित होगा। सोल के रक्षा मंत्रालय ने जानकारी दी है कि इस मिशन के लिए लगभग 40 विशेषज्ञों की एक टीम तैनात की गई है। इस टीम में दक्षिण कोरिया की नौसेना (फर्स्ट फ्लीट), वायु सेना (18वें फाइटर विंग) के अलावा अमेरिकी रक्षा विभाग की 'POW/MIA अकाउंटिंग एजेंसी' (DPAA) के अंडरवॉटर प्लानर और गोताखोर शामिल हैं।
किन विमानों का मलबा खोजा जाएगा?
अभियान का पहला निशाना यांगयांग काउंटी के पास समुद्र में गिरा एक अमेरिकी F4U कॉर्सेयर लड़ाकू विमान है। रिकॉर्ड के मुताबिक, यह विमान फरवरी 1952 में एक क्षतिग्रस्त अमेरिकी बॉम्बर को सुरक्षा देते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें पायलट की मौत हो गई थी।
इसके बाद, टीम अपना ध्यान गंगनेउंग क्षेत्र की ओर केंद्रित करेगी। यहाँ अमेरिकी सैन्य परिवहन विमान कर्टिस सी-46 कमांडो के मलबे की तलाश की जाएगी, जो 1952 में दो अलग-अलग घटनाओं में दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। पहली दुर्घटना में विमान में सवार सभी 17 लोग लापता हो गए थे, जबकि दूसरी घटना में 2 शव मिले थे और 7 अन्य लापता थे।
आधुनिक तकनीक का होगा इस्तेमाल
संयुक्त सर्वेक्षण टीम इस खोज के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करेगी। पानी के नीचे डिटेक्टर उपकरण और समुद्री मानवरहित प्रणालियों (ड्रोन) के ज़रिए संभावित मलबे का पता लगाया जाएगा। किसी वस्तु का संकेत मिलने पर गोताखोरों या रिमोट सेंसिंग उपकरणों को भेजकर उसकी जाँच की जाएगी। बता दें कि युद्ध में मारे गए अमेरिकी सैनिकों के अवशेषों को खोजने के लिए सोल और वाशिंगटन के बीच 2011 में एक समझौता हुआ था, जिसके तहत वे लगातार संयुक्त प्रयास करते रहे हैं।
इनपुट: IANS



