पासपोर्ट-वीज़ा आउटसोर्सिंग: सुप्रीम कोर्ट ने 4 भारतीय मिशनों का टेंडर रद्द करने का फैसला रखा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने विदेश मंत्रालय को एक बड़ा निर्देश देते हुए चार देशों में स्थित भारतीय मिशनों में पासपोर्ट और वीज़ा सेवाओं की आउटसोर्सिंग के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर नए सिरे से…
सुप्रीम कोर्ट ने विदेश मंत्रालय को एक बड़ा निर्देश देते हुए चार देशों में स्थित भारतीय मिशनों में पासपोर्ट और वीज़ा सेवाओं की आउटसोर्सिंग के लिए जारी टेंडर प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर नए सिरे से पूरा करने को कहा है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें मौजूदा तकनीकी मूल्यांकन प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया था।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह मामला अबू धाबी, कुवैत, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा स्थित भारतीय मिशनों में कॉन्सुलर, पासपोर्ट और वीजा (सीपीवी) सेवाओं से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के 15 जुलाई के फैसले को चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय में दखल देने से साफ इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने टेंडर प्रक्रिया को रद्द करने में गलती की थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया।
सेवाएं बाधित न हों, इसलिए अंतरिम व्यवस्था
पासपोर्ट और वीज़ा जैसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं में कोई रुकावट न आए, इसे ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था का निर्देश दिया है। अदालत ने विदेश मंत्रालय को अनुमति दी है कि नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने तक वह या तो मौजूदा सेवा प्रदाताओं से काम जारी रखवा सकता है, यदि उनका प्रदर्शन संतोषजनक रहा हो, या फिर किसी अन्य एजेंसी को अस्थायी तौर पर नियुक्त कर सकता है। यह व्यवस्था पूरी तरह अस्थायी होगी और इससे किसी भी पक्ष को कोई विशेष अधिकार नहीं मिलेगा।
क्या था दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला?
15 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि बोली लगाने वालों के मूल्यांकन की प्रक्रिया में "मनमानेपन, अतार्किकता और पारदर्शिता की कमी" थी, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस शैल जैन की खंडपीठ ने ई ट्रैव टेक लिमिटेड और वेरासिस लिमिटेड की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था, जिन्हें तकनीकी बोली में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सफल बोलीदाताओं को दिए गए अनुबंध रद्द करते हुए मंत्रालय को नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी।
इनपुट: IANS



