फांसी से मौत: सुप्रीम कोर्ट का रोक लगाने से इनकार, लेकिन दूसरे विकल्पों पर विचार की दी अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने देश में मौत की सज़ा के लिए फांसी के तरीके पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को दिए अपने फैसले में अदालत ने कहा कि वह इस संबंध में कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं करेगी…
सुप्रीम कोर्ट ने देश में मौत की सज़ा के लिए फांसी के तरीके पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मंगलवार को दिए अपने फैसले में अदालत ने कहा कि वह इस संबंध में कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं करेगी, लेकिन साथ ही सरकार को भविष्य में दूसरे मानवीय और वैज्ञानिक विकल्पों को तलाशने की स्वतंत्रता दी है।
समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, यह सुनवाई सीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा द्वारा 2017 में दायर एक याचिका पर हो रही थी। इस याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) को चुनौती दी गई थी, जिसमें 'फांसी देकर मौत' का प्रावधान है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
याचिका में क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ता ऋषि मल्होत्रा ने 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को जीवन के अधिकार का एक अहम हिस्सा बताते हुए तर्क दिया कि फांसी एक क्रूर और बर्बर प्रक्रिया है। उन्होंने अदालत से फांसी की जगह घातक इंजेक्शन जैसे अधिक मानवीय विकल्पों को अपनाने का आग्रह किया, जैसा कि कुछ अन्य देशों में होता है। मल्होत्रा ने यह सुझाव भी दिया कि मौत की सज़ा पाए कैदियों को सज़ा के तरीके को चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।
पुराने फैसले पर पुनर्विचार से इनकार
याचिका में 1983 के 'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा की भी मांग की गई थी, जिसमें फांसी को संवैधानिक रूप से सही ठहराया गया था। हालांकि, बेंच ने उस पुराने फैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें 'दुर्लभतम मामलों' में फांसी को सज़ा का एक सही तरीका माना गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 'प्रोजेक्ट 39ए' से जुड़ीं सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा की राय भी ली। उन्होंने मामले को एक विशेषज्ञ समिति को सौंपने का सुझाव देते हुए कहा कि घातक इंजेक्शन का तरीका भी बहुत सफल नहीं पाया गया है। अंततः, कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार भविष्य में कैदियों की गरिमा बनाए रखने और उन्हें कम दर्द देने वाले विकल्पों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है।
इनपुट: IANS



