शिवसेना (UBT) का केंद्र पर निशाना: तीन साल में 1.21 लाख से ज़्यादा MSME बंद, लाखों नौकरियां गईं
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने केंद्र सरकार पर देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में सरकार द्वारा…
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने केंद्र सरकार पर देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में सरकार द्वारा लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि पिछले तीन वर्षों में 1,21,805 MSME इकाइयां बंद हो गई हैं, जिससे लाखों युवाओं को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, शिवसेना (UBT) ने संपादकीय में कहा कि MSME क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, जो कृषि के बाद सबसे ज़्यादा रोज़गार देता है और निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद, पार्टी का आरोप है कि पिछले एक दशक में इन इकाइयों के बंद होने की गति लगातार बढ़ी है।
राज्यों पर असर और सरकारी दावे
आंकड़ों के मुताबिक, MSME इकाइयों के बंद होने का सबसे ज़्यादा असर महाराष्ट्र पर पड़ा, जहां 28,764 इकाइयां बंद हुईं। इसके बाद तमिलनाडु (14,176), गुजरात (11,150) और राजस्थान (9,881) का स्थान है। संपादकीय में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ये आंकड़े बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश और रोज़गार सृजन के सरकारी दावों से मेल नहीं खाते हैं।
लाखों करोड़ के कर्ज़ के बावजूद संकट
शिवसेना (UBT) ने यह भी दावा किया कि पिछले 10 वर्षों में सरकार ने स्टार्टअप और MSME क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 35 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा के ऋण उपलब्ध कराए। लेकिन इसके बावजूद, उद्यमियों को बढ़ती परिचालन लागत, बाज़ार की चुनौतियों और प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी ने संपादकीय में लिखा, "पिछले 12 वर्षों से देश में पुराने उद्योग बंद हो रहे हैं और नए उद्योग शुरू करने की बातें हो रही हैं। जिस शासन में युवाओं के हाथों में रोजगार देने के बजाय उनके मन में धार्मिक उन्माद भरा जाए, वहां इससे अलग परिणाम की उम्मीद कैसे की जा सकती है?"
संपादकीय में इस बात की भी आलोचना की गई कि जहां एक ओर नेता दावोस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नए निवेश लाने की कोशिश करते हैं, वहीं संकटग्रस्त मौजूदा उद्योगों को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। पार्टी के अनुसार, बीमार उद्योगों के पुनर्वास की कोई लक्षित योजना न होने से बैंकों के NPA बढ़ रहे हैं और हज़ारों नौकरियां अचानक खत्म हो रही हैं।
इनपुट: IANS



