बांग्लादेश: अल्पसंख्यकों के खिलाफ 'हथियार' बन रहे ईशनिंदा के आरोप, मानवाधिकार संगठन ने जताई चिंता
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने देश में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि इन आरोपों को अल्पसंख
बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन ने देश में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि इन आरोपों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक “हथियार” के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे एक खतरनाक सामाजिक पैटर्न बनता जा रहा है। समाचार एजेंसी IANS से मिली जानकारी के अनुसार, इस साल के पहले छह महीनों में ही ऐसे 17 मामले सामने आ चुके हैं।
ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि “सामाजिक हिंसा की एक दोहराई जाने वाली प्रक्रिया” बन गई है। संगठन ने बताया कि पिछले साल भी ईशनिंदा के आरोपों में 73 अल्पसंख्यक युवाओं को गिरफ्तार किया गया था।
हालिया मामला और हिंसा का पैटर्न
संगठन ने सुनामगंज जिले के ताहिरपुर उपजिला में हिंदू युवक दीप्तो राय पर लगे हालिया ईशनिंदा के आरोप को इस चिंताजनक प्रवृत्ति का उदाहरण बताया। HRCBM ने पीड़ित परिवार और चश्मदीदों का हवाला देते हुए इस आरोप को “झूठा और आधारहीन” करार दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही सोशल मीडिया पर कोई आरोप सामने आता है, तुरंत भीड़ इकट्ठा हो जाती है और पुलिस कार्रवाई शुरू कर देती है। यह सब डिजिटल फॉरेंसिक जांच पूरी होने से बहुत पहले हो जाता है, जिससे आरोपी और उसके परिवार पर भारी सामाजिक दबाव बनता है। इस प्रक्रिया में अक्सर आरोपी के परिवार, उनकी आजीविका और यहां तक कि स्थानीय धार्मिक स्थलों पर भी हमले होते हैं।
कानूनी प्रक्रिया से पहले ही सज़ा जैसा माहौल
HRCBM ने इस बात पर जोर दिया कि असली समस्या सिर्फ आरोप लगना नहीं है, बल्कि आरोप लगते ही एक सज़ा जैसा माहौल बना देना है। संगठन के अनुसार, एफआईआर में सोशल मीडिया पोस्ट, फोन जब्त करने और साइबर कानूनों का जिक्र तो होता है, लेकिन गिरफ्तारी के समय यह भी स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी ने वास्तव में वह सामग्री पोस्ट की थी या नहीं। इस तरह अदालती या फोरेंसिक जांच से पहले ही पूरे समुदाय को निशाना बना लिया जाता है।
इसे “राष्ट्रीय अल्पसंख्यक सुरक्षा आपातकाल” बताते हुए, HRCBM ने बांग्लादेश सरकार, पुलिस, न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से इस चक्र को तोड़ने की अपील की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर इसे नहीं रोका गया, तो ईशनिंदा के आरोप अल्पसंख्यकों के लिए भय, विस्थापन और सामूहिक दमन का माध्यम बने रहेंगे।
इनपुट: IANS



