बैटरी स्टोरेज वाली सौर ऊर्जा भारत में नए कोयले से भी सस्ती और भरोसेमंद: अमेरिकी अध्ययन
भारत में ऊर्जा क्षेत्र एक बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है, जहाँ बैटरी स्टोरेज के साथ नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) अब नए कोयला बिजलीघरों से भी कम लागत पर 24 घंटे भरोसेमंद बिजली दे सकती है…
भारत में ऊर्जा क्षेत्र एक बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है, जहाँ बैटरी स्टोरेज के साथ नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) अब नए कोयला बिजलीघरों से भी कम लागत पर 24 घंटे भरोसेमंद बिजली दे सकती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के एक नए अध्ययन में यह दावा किया गया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मॉडल न सिर्फ़ ऊर्जा की लागत कम करेगा, बल्कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने में भी बड़ी मदद देगा।
इस अध्ययन का आधार भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) द्वारा आयोजित 1,000 मेगावाट क्षमता की एक नीलामी है। इस नीलामी के नतीजों ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा, क्योंकि इसमें 25 साल के लिए बिजली की दर 5.25 रुपये प्रति किलोवाट-घंटे पर तय हुई। यह दिखाता है कि बाज़ार अब बैटरी-समर्थित सौर ऊर्जा को एक स्थिर और विश्वसनीय विकल्प मान रहा है।
कोयले जैसा भरोसा, पर दाम स्थिर
अध्ययन के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह परिणाम साबित करता है कि सौर और बैटरी का संयोजन कोयले से मिलने वाली बिजली की तरह ही निरंतर आपूर्ति कर सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें ईंधन की कीमतों में भविष्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का कोई जोखिम नहीं है। "इंडियाज रिन्यूएबल एनर्जी ब्रेकथ्रू: कोल-लाइक रिलायबिलिटी ऐट अ लोअर, फिक्स्ड प्राइस" शीर्षक वाले इस अध्ययन में कहा गया है कि यह भारत के मौजूदा कोयला संयंत्रों के प्रदर्शन के बराबर है।
नीलामी की खास शर्तें
इस नीलामी की संरचना बेहद अनूठी थी, जिसमें बिजली उत्पादकों को शाम, रात और सुबह के व्यस्त समय (पीक आवर्स) में सबसे ज़्यादा बिजली देने के लिए कहा गया था।
मुख्य शर्तें इस प्रकार थीं:
- खरीदार द्वारा चुने गए 6 पीक घंटों में कम से कम 90% अनुबंधित क्षमता की आपूर्ति अनिवार्य थी।
- अन्य गैर-सौर घंटों में यह सीमा 70% और दिन के सौर घंटों में 50-60% रखी गई।
- अगर कोई कंपनी हर 15 मिनट के ब्लॉक में निर्धारित आपूर्ति में विफल रहती है, तो उस पर अनुबंध मूल्य का डेढ़ गुना जुर्माना लगाया जाएगा।
शोधकर्ताओं ने 10 भारतीय राज्यों के 10 वर्षों के मौसम आंकड़ों का विश्लेषण करके पाया कि राजस्थान जैसे राज्यों में 1,000 मेगावाट की अनुबंधित बिजली के लिए लगभग 3 गीगावाट सौर क्षमता और 12 गीगावाट-घंटे की बैटरी स्टोरेज की आवश्यकता होगी।
भारत के लिए क्यों फायदेमंद है यह मॉडल?
अध्ययन के प्रमुख लेखक उमेद पालीवाल के अनुसार, भारत की भौगोलिक स्थिति इस मॉडल के लिए बेहद अनुकूल है। भूमध्य रेखा के पास होने के कारण यहाँ साल भर सौर ऊर्जा उत्पादन में बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता। उन्होंने कहा, "भारत की मुख्य चुनौती दिन की अतिरिक्त सौर ऊर्जा को शाम और रात के लिए बचाना है, जो कम लागत वाली आधुनिक बैटरियों से संभव है।"
अध्ययन के सह-लेखक निकित अभ्यंकर ने बताया कि नीलामी में 16 कंपनियों ने हिस्सा लिया और सात डेवलपर्स को प्रोजेक्ट आवंटित हुए, जिनकी बोलियां 5.25 से 5.26 रुपये प्रति यूनिट के बेहद मामूली अंतर पर थीं। यह दिखाता है कि यह किसी एक कंपनी की आक्रामक बोली नहीं, बल्कि एक स्थापित बाज़ार मूल्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारत की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के साथ-साथ डेटा सेंटर और विनिर्माण जैसे उद्योगों के लिए भी एक आकर्षक विकल्प बन सकता है, जिन्हें लगातार बिजली की जरूरत होती है।
इनपुट: IANS



