भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि: रिपोर्ट में कहा गया- 'पड़ोसी जैसा व्यवहार' करे पाकिस्तान
भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान अपना रुख नहीं बदलता, तब तक सिंधु जल का सामान्य प्रवाह एक 'दूर का सपना' बना रहेगा। समाचार एजेंसी…
भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने सिंधु जल समझौते पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान अपना रुख नहीं बदलता, तब तक सिंधु जल का सामान्य प्रवाह एक 'दूर का सपना' बना रहेगा। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से आई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान को भारत के साथ एक अच्छे पड़ोसी की तरह व्यवहार करना सीखना होगा, जैसा कि भारत ने 1947 में विभाजन के बाद से किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित करने का निर्णय "रणनीतिक और तार्किक" था। यह फैसला पिछले साल पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा पहलगाम में किए गए हमले के बाद लिया गया था, जिसमें 26 निर्दोष नागरिक मारे गए थे। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि "पानी और खून साथ नहीं बह सकते, और न ही आतंक और व्यापार साथ चल सकते हैं।"
समझौते की भावना का उल्लंघन
मीडिया इंडिया ग्रुप की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 1960 में हुआ यह समझौता बिना शर्त भरोसे पर आधारित था, जिसमें सारी जिम्मेदारियाँ भारत पर थीं जबकि उसे बदले में कोई लाभ नहीं मिल रहा था। पाकिस्तान द्वारा लगातार सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने, शत्रुतापूर्ण बयानबाजी करने और परमाणु हमले जैसी धमकियाँ देने से इस संधि की मूल भावना कमजोर हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान शांतिपूर्ण संबंध बनाने और रचनात्मक बातचीत के लिए जरूरी प्रतिबद्धता दिखाने में नाकाम रहा है।
भारत का स्पष्ट रुख
रिपोर्ट में उल्लेख है कि भारत अपने इस रुख पर कायम है कि जब तक आतंक और हिंसा से मुक्त माहौल नहीं बनता, तब तक पाकिस्तान के साथ कोई सार्थक बातचीत संभव नहीं है। नई दिल्ली ने साफ किया है कि पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए न हो। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ चार पारंपरिक युद्ध छेड़े और हर बार उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।
बदलाव की जरूरत कहाँ?
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि पाकिस्तान को अपनी राष्ट्रीय चेतना में मौलिक बदलाव लाने की जरूरत है। इसके लिए सेना के वैचारिक एकाधिकार को खत्म करना होगा, लोकतांत्रिक जवाबदेही लानी होगी और पाकिस्तान को खुद को भारत के खिलाफ एक गढ़ के रूप में देखना बंद करना होगा। रिपोर्ट के शब्दों में, "इस कायापलट के बिना पाकिस्तान से कोई भी संवाद नाजुक, अस्थिर रहेगा और हर पहल नाकाम होने के लिए अभिशप्त है।"
इनपुट: IANS



