पाकिस्तान: बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध और सज़ा की बेहद कम दर, एक रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े
पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन चिंता की बात यह है कि ऐसे गंभीर अपराधों में दोषियों को सज़ा मिलने की दर बेहद कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वजह से…
पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन चिंता की बात यह है कि ऐसे गंभीर अपराधों में दोषियों को सज़ा मिलने की दर बेहद कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वजह से अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों की सुरक्षा, अपराध की रोकथाम और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक मज़बूत व्यवस्था विकसित करने में नाकामी इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
यह मुद्दा हाल ही में फिर तब सुर्खियों में आया जब कराची में 18 महीने की बच्ची ऐजल की यौन उत्पीड़न के बाद मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, एक किशोर रिश्तेदार ही बच्ची को घर से ले गया था। इसी तरह अगस्त में, पांच साल की आयत नूर का शव एक कुएं से मिला था, जिसकी जांच में यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई। ये घटनाएं पाकिस्तान में बच्चों की असुरक्षा की भयावह तस्वीर पेश करती हैं।
साहिल की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
बाल संरक्षण संस्था 'साहिल' द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 के पहले छह महीनों में ही बच्चों के खिलाफ उत्पीड़न के 1,914 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े पाकिस्तान के बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब, सिंध, इस्लामाबाद, पीओके और पीओजीबी के समाचार पत्रों से जुटाए गए हैं।
रिपोर्ट में इन मामलों का वर्गीकरण भी किया गया है, जिसमें बाल यौन शोषण के 1,015, अपहरण के 558, लापता बच्चों के 101, अश्लील सामग्री से जुड़े 98 और बाल विवाह के 35 मामले शामिल हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इसी अवधि में 49 नवजात और लावारिस बच्चे भी मिले।
कौन हैं पीड़ित और कौन अपराधी?
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि कुल पीड़ितों में 58 प्रतिशत लड़कियां थीं। उम्र के हिसाब से देखें तो सबसे ज़्यादा 598 पीड़ित बच्चे 11 से 15 साल के थे। इसके बाद 356 बच्चे 16-18 साल, 329 बच्चे 6-10 साल और 95 बच्चे 0-5 साल के आयु वर्ग के थे। वहीं, 487 मामलों में पीड़ितों की उम्र का ज़िक्र नहीं था।
रिपोर्ट के अनुसार, 43% मामलों में आरोपी पीड़ितों के परिचित थे, जबकि 34% मामलों में वे अजनबी थे। अपराध के स्थान को देखें तो 57% घटनाएं शहरी क्षेत्रों में और 43% ग्रामीण इलाकों में हुईं।
कानून हैं, पर अमल कमज़ोर
रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि पाकिस्तान ने दोषियों के लिए सज़ा कड़ी करने हेतु कानूनी सुधार तो किए हैं, लेकिन जांच प्रक्रिया और पीड़ितों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए हैं। लंबी न्यायिक प्रक्रिया और कमज़ोर फॉलो-अप के कारण बहुत कम मामलों में सज़ा हो पाती है। कई बार एक मामले की जांच के दौरान आरोपी के फोन से कई अन्य पीड़ितों से जुड़े सबूत भी मिलते हैं, जो यह दिखाता है कि अपराधी लंबे समय तक बेखौफ होकर अपराध करते रहते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायिक कमजोरियों के अलावा गरीबी, बाल श्रम और असुरक्षित सामाजिक माहौल भी बच्चों को शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।
इनपुट: IANS



