शनिवार, 29 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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अफगानिस्तान में पकड़ ढीली होने पर पाकिस्तान की रणनीति में बदलाव, आतंकी गुटों पर नरम पड़ने का आरोप

अफगानिस्तान में तालिबान शासन पर अपनी कूटनीतिक पकड़ कमजोर पड़ती देख पाकिस्तान कथित तौर पर अपनी पुरानी रणनीति की ओर लौट रहा है। समाचार एजेंसी IANS ने एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि पाकिस्तान अब…

अफगानिस्तान में पकड़ ढीली होने पर पाकिस्तान की रणनीति में बदलाव, आतंकी गुटों पर नरम पड़ने का आरोप
(फोटो: IANS)

अफगानिस्तान में तालिबान शासन पर अपनी कूटनीतिक पकड़ कमजोर पड़ती देख पाकिस्तान कथित तौर पर अपनी पुरानी रणनीति की ओर लौट रहा है। समाचार एजेंसी IANS ने एक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि पाकिस्तान अब चुनिंदा आतंकवादी समूहों को बर्दाश्त करने की नीति अपना सकता है, ताकि क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रख सके। यह बदलाव पाकिस्तान की दशकों पुरानी 'रणनीतिक गहराई' (Strategic Depth) की नीति के असफल होने का संकेत है।

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ऑनलाइन मैगज़ीन 'अमेरिकन थिंकर' की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की लंबे समय से यह सोच थी कि काबुल में एक मित्र सरकार होने से उसे भारत के खिलाफ बढ़त मिलेगी। अगस्त 2021 में जब तालिबान सत्ता में लौटा, तो इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि तालिबान उसके निर्देशों का पालन करेगा। लेकिन तालिबान ने अपनी स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी, जिससे दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए हैं। अब सीमा पर झड़पें, हवाई हमले और एक-दूसरे पर आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप आम हो गए हैं।

तालिबान और ISKP का टकराव

रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकी समूह 'इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस' (ISKP) के नेटवर्क पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में अभी भी सक्रिय हैं। तालिबान ने पाकिस्तान पर यह आरोप लगाया है कि वह अपनी धरती से ISKP को ऑपरेट करने की अनुमति दे रहा है। तालिबान ने ISKP नेता सनाउल्लाह गफारी के पाकिस्तानी आतंकी कैंपों में आने-जाने का भी हवाला दिया।

वहीं, ISKP तालिबान का सबसे खतरनाक जिहादी दुश्मन बना हुआ है, जो तालिबान के शासन को गैर-कानूनी मानता है। 2021 से तालिबान इस समूह के खिलाफ एक आक्रामक अभियान चला रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान ISKP के प्रति नरमी बरतता है, तो इससे तालिबान के आतंकवाद विरोधी प्रयासों को धक्का लग सकता है।

आर्थिक और रणनीतिक दबाव

इस पूरे मामले में चीन को अफगानिस्तान से जोड़ने वाला वाखान कॉरिडोर एक अहम केंद्र बन गया है। अफगानिस्तान इस कॉरिडोर के जरिए पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम करके सीधे चीन से व्यापार करना चाहता है। रिपोर्ट बताती है कि इस रास्ते का लगभग 70 प्रतिशत काम मई 2026 तक पूरा हो चुका था।

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर यह कॉरिडोर चालू होता है तो इससे अफगानिस्तान पर पाकिस्तान का पारंपरिक दबदबा कम हो जाएगा। पाकिस्तान को इस बात से भी लाभ हो सकता है कि बदख्शान प्रांत और वाखान कॉरिडोर के आसपास अस्थिरता बनी रहे, ताकि चीन के साथ अफगानिस्तान का सीधा संपर्क स्थापित होने में देरी हो।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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