गुरूवार, 24 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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पाकिस्तान के दावे और ज़मीनी हकीकत: क्या आतंकवाद पर सचमुच बदल रहा है रवैया?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में दावा किया है कि उनके देश ने आतंकवादी समूहों पर नियंत्रण पा लिया है। लेकिन कई रिपोर्टें और ऐतिहासिक घटनाएं इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती…

पाकिस्तान के दावे और ज़मीनी हकीकत: क्या आतंकवाद पर सचमुच बदल रहा है रवैया?
(फोटो: IANS)

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में दावा किया है कि उनके देश ने आतंकवादी समूहों पर नियंत्रण पा लिया है। लेकिन कई रिपोर्टें और ऐतिहासिक घटनाएं इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं, जो पाकिस्तान के दोहरे रवैये की ओर इशारा करती हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में आतंकी नेटवर्क की मौजूदगी और उन्हें मिलने वाले कथित संरक्षण का एक लंबा इतिहास रहा है, जो महज बयानों से खत्म होता नहीं दिखता।

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यह विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब खुद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी सरकारें 30 वर्षों से आतंकवादियों का समर्थन करती रही हैं। उन्होंने यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए हमले के कुछ दिनों बाद की थी, जिसमें 26 नागरिकों की जान चली गई थी। इसी हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' ने ली थी, जिसके जवाब में आसिफ ने कहा था, "लश्कर बीते समय का नाम है। अब उसका अस्तित्व नहीं है।"

आतंकी नेताओं से मेलजोल और सरकारी संरक्षण के आरोप

आधिकारिक दावों के विपरीत, पाकिस्तान के वरिष्ठ नेताओं की वैश्विक आतंकवादियों के साथ तस्वीरें सामने आती रही हैं। लगभग चार महीने पहले, प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार और संघीय मंत्री सीनेटर राणा सनाउल्लाह खान को वैश्विक आतंकवादी हाफिज तल्हा सईद के साथ बातचीत करते देखा गया था। तल्हा सईद 2008 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का बेटा है।

हालिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हत्या की कई कोशिशों के बाद हाफिज सईद की सुरक्षा बढ़ा दी है और उसे लाहौर में एक सुरक्षित ठिकाने पर रखा है। इसी तरह, 2019 के पुलवामा हमले के लिए जिम्मेदार जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मसूद अजहर भी कथित तौर पर पाकिस्तान में ही मौजूद है।

सेना और ISI की भूमिका पर सवाल

विशेषज्ञ लंबे समय से पाकिस्तान की नागरिक सरकार पर सैन्य प्रतिष्ठान, खासकर रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय के गहरे प्रभाव की बात करते रहे हैं। लेखक ओवेन एल. सिर्स अपनी किताब में लिखते हैं कि ISI प्रधानमंत्री के बजाय सेना प्रमुख के निर्देशों के तहत काम करती है। हाल के दिनों में सेना प्रमुख सैयद आसिम मुनीर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में बढ़ी सक्रियता को इसी के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री शरीफ के लिए शक्तिशाली सेना प्रमुख के खिलाफ बोलना संभव नहीं हो सकता।

आतंकवाद से जुड़े होने का लंबा इतिहास

पाकिस्तान का नाम कई बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी हमलों से जुड़ा रहा है:

  • 2008 मुंबई हमला: लश्कर-ए-तैयबा द्वारा किए गए इस हमले में 166 लोग मारे गए थे, जिसके संस्थापक हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है।
  • 9/11 अमेरिकी हमला: अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और हमले के प्रमुख साजिशकर्ताओं में से एक खालिद शेख मोहम्मद को 2003 में रावलपिंडी से गिरफ्तार किया गया था।
  • ओसामा बिन लादेन: 2011 में अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एबटाबाद में सैन्य अकादमी के पास एक ठिकाने में मारा गया था।
  • डेनियल पर्ल हत्याकांड: 2002 में वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की पाकिस्तान में हत्या कर दी गई थी। वह चरमपंथी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क के बीच संबंधों की जांच कर रहे थे।

इन घटनाओं के अलावा, 2005 के लंदन बम धमाकों और 2010 के न्यूयॉर्क टाइम्स स्क्वायर पर नाकाम हमले के तार भी पाकिस्तान से जुड़े पाए गए थे। जब तक आतंकी संगठनों के प्रमुख और कमांडर पाकिस्तान में बिना किसी प्रभावी कार्रवाई के मौजूद रहेंगे, तब तक आतंकवाद खत्म करने के उसके दावों पर सवाल उठना लाजिमी है।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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