कच्चे तेल का उबाल: 108 डॉलर पार; जानिए भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या होगा असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें 107-108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस उछाल ने…
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें 107-108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस उछाल ने भारत के लिए चिंताएं ज़रूर बढ़ाई हैं, लेकिन विशेषज्ञ इसे फिलहाल एक व्यापक आर्थिक संकट नहीं मान रहे। इसकी मुख्य वजह देश के मजबूत आर्थिक संकेतक हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस झटके को सहने के लिए पहले से बेहतर स्थिति में है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 785.7 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, जो किसी भी बाहरी संकट से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करता है। इसके अलावा, महंगाई दर नियंत्रण में है और चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा (CAD) भी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.8 प्रतिशत रहा है, जो एक आरामदायक स्तर है।
महंगाई और सरकारी खजाने पर असर
हालांकि, अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 88.6% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऊंची कीमतें सीधे तौर पर आयात बिल को बढ़ा देती हैं। आरबीआई के एक अध्ययन के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से खुदरा महंगाई में करीब 49 आधार अंकों (0.49%) की वृद्धि हो सकती है।
इसका असर परिवहन, खाद्य वस्तुओं और निर्मित उत्पादों की लागत पर भी पड़ता है। पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से आम परिवारों का बजट बिगड़ सकता है। अगर सरकार उत्पाद शुल्क घटाकर या सब्सिडी बढ़ाकर जनता को राहत देती है, तो इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा।
विभिन्न उद्योगों पर क्या होगा प्रभाव?
तेल की बढ़ती कीमतों का असर अलग-अलग सेक्टरों पर अलग-अलग होगा। एयरलाइंस, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक्स और सीमेंट जैसे उद्योगों की लागत बढ़ेगी, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आ सकता है। वहीं, ओएनजीसी (ONGC) और ऑयल इंडिया जैसी तेल उत्पादक कंपनियों को ऊंची कीमतों से फायदा हो सकता है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल का औसत भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर जीडीपी का 1.9 से 2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। पहले इसका अनुमान 0.7 से 0.8 प्रतिशत के बीच था। सोमवार को नवंबर डिलीवरी के लिए ब्रेंट क्रूड 107.82 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 103 डॉलर से ऊपर कारोबार कर रहा था।
इनपुट: IANS



