NSE का 30,000 करोड़ का IPO: एक दशक के इंतज़ार और नई चुनौतियों के बीच लिस्टिंग की तैयारी
देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बहुप्रतीक्षित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) जल्द ही आ सकता है, लेकिन एक दशक की देरी और हालिया नियामकीय बदलावों ने इसकी राह में नई चुनौतिय
देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बहुप्रतीक्षित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) जल्द ही आ सकता है, लेकिन एक दशक की देरी और हालिया नियामकीय बदलावों ने इसकी राह में नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 30,000 करोड़ रुपए का यह आईपीओ भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा इश्यू हो सकता है, लेकिन एक्सचेंज के ऑप्शंस कारोबार में आई सुस्ती इसके मुनाफे और बाजार हिस्सेदारी पर असर डाल रही है।
यह आईपीओ लगभग 10 साल से अटका हुआ है, जिसकी मुख्य वजह 2010 से 2014 के बीच सामने आया को-लोकेशन विवाद था। इस मामले में कुछ ब्रोकर्स पर आरोप था कि वे NSE के डेटा सेंटर से दूसरों की तुलना में कुछ मिलीसेकंड पहले जानकारी हासिल कर लेते थे। फॉरेंसिक ऑडिट में इसकी पुष्टि के बाद सेबी ने जांच शुरू की, जिससे 2016 में दाखिल आईपीओ की प्रक्रिया रुक गई।
विवादों का निपटारा और IPO की वापसी
वैल्यू रिसर्च की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि यह लंबा कानूनी मामला अब अपने अंतिम चरण में है। NSE ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के साथ 1,491 करोड़ रुपए के संशोधित सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया है, जिसे मंजूरी मिलने की उम्मीद है। इसी बीच, 2022 में आशीष चौहान की NSE में वापसी ने आईपीओ प्रक्रिया को फिर से पटरी पर लाने में अहम भूमिका निभाई। चौहान, जो NSE की संस्थापक टीम का हिस्सा थे और बाद में BSE की सफल लिस्टिंग का नेतृत्व कर चुके हैं, ने एक्सचेंज की नियामकीय विश्वसनीयता को मजबूत किया है।
ऑप्शंस ट्रेडिंग पर निर्भरता और नई चुनौतियां
पिछले एक दशक में, जब NSE लिस्ट नहीं हो सका, तब उसके कारोबार में जबरदस्त उछाल आया। एक्सचेंज की आय लगभग 9 गुना बढ़ गई, जिसका मुख्य कारण डेरिवेटिव्स, खासकर ऑप्शंस ट्रेडिंग में हुई तेज वृद्धि थी। आज NSE की कुल परिचालन आय का लगभग 60% हिस्सा सिर्फ ऑप्शंस ट्रेडिंग से आता है। हालांकि, यही सेगमेंट अब नियामकीय जांच के दायरे में है। सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में 91% रिटेल F&O ट्रेडर्स को कुल 1.1 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा हुआ।
इसी को देखते हुए सेबी ने 2024 से डेरिवेटिव्स बाजार के लिए कई नए नियम लागू किए। इन बदलावों का असर वित्त वर्ष 2026 में देखने को मिला, जो इन नियमों के तहत काम करने वाला पहला पूरा साल था। इस दौरान NSE की परिचालन आय में करीब 3% की गिरावट आई और समायोजित शुद्ध लाभ 17% घटकर 9,101 करोड़ रुपए रह गया। इसी अवधि में, इक्विटी ऑप्शंस बाजार में NSE की हिस्सेदारी भी 97% से घटकर 75% पर आ गई, जो दिखाता है कि एक्सचेंज की कमाई अभी भी काफी हद तक ऑप्शंस कारोबार पर निर्भर है।
इनपुट: IANS



