महाराष्ट्र में सूखे का संकट: रोहित पवार ने 1972 से भी बदतर हालात बताते हुए सरकार से तत्काल मदद मांगी
महाराष्ट्र में मानसून की बेरुखी और कम बारिश के कारण किसानों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि राज्य में सूखे की…
महाराष्ट्र में मानसून की बेरुखी और कम बारिश के कारण किसानों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के विधायक रोहित पवार ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि राज्य में सूखे की स्थिति 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी बदतर हो गई है और सरकार इस गंभीर समस्या से आंखें मूंदे हुए है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, पवार ने कहा कि मौजूदा हालात में किसानों को 77,000 करोड़ रुपये से अधिक का भारी कृषि नुकसान हुआ है।
रोहित पवार ने बताया कि किसानों ने बुवाई पर करीब 95,500 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जिससे उन्हें 1,28,866 करोड़ रुपये की पैदावार की उम्मीद थी। लेकिन अनियमित मानसून और 'अल नीनो' के प्रभाव ने सोयाबीन, कपास, अरहर (तुअर) और मक्का जैसी प्रमुख खरीफ फसलों को बड़े पैमाने पर बर्बाद कर दिया, जिससे उनका सारा निवेश डूब गया।
बारिश की कमी और सरकारी उदासीनता
आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कुल 783.6 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य से 20.50 प्रतिशत कम है। नासिक डिवीजन में यह कमी सबसे ज्यादा 34.30 प्रतिशत रही, जबकि नागपुर में 25 प्रतिशत और कोंकण में 9.80 प्रतिशत कम बारिश हुई। पवार ने अपने विधानसभा क्षेत्र कर्जत-जामखेड़ का उदाहरण देते हुए कहा, "वहां सामान्य की तुलना में सिर्फ 40 प्रतिशत बारिश हुई है, यानी 60 प्रतिशत की भारी कमी। किसान अपनी खेती की लागत भी नहीं निकाल पाए हैं, उनकी कमर टूट गई है।"
उन्होंने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को दिखाने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जालना के एक किसान से लाइव वीडियो कॉल पर बात की। किसान ने बताया कि प्रीमियम भरने के बाद भी उन्हें फसल बीमा का पैसा देने से इनकार कर दिया गया और अधिकारियों ने कहा कि योजना बंद हो गई है। किसान ने यह भी कहा कि नुकसान का आकलन करने के लिए कोई भी सरकारी सर्वेक्षक उनके खेतों तक नहीं पहुंचा।
राहत पैकेज और प्रमुख मांगें
पवार ने सरकार की राहत योजनाओं को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) से प्रति हेक्टेयर 8,500 रुपये की मदद 'किसानों का अपमान' है, जबकि लागत 50,000 से 60,000 रुपये प्रति एकड़ आती है। उन्होंने मांग की कि किसानों को प्रति हेक्टेयर कम से कम 50,000 रुपये की एकमुश्त राहत दी जाए।
उन्होंने फसल बीमा योजना की भी आलोचना करते हुए कहा कि किसानों और सरकार ने मिलकर बीमा कंपनियों को 2,394 करोड़ रुपये का प्रीमियम दिया, जबकि किसानों को मुआवजे के रूप में सिर्फ 1,938 करोड़ रुपये मिले। इसके साथ ही, उन्होंने सूखे से प्रभावित जिलों में कॉलेज की फीस पूरी तरह माफ करने, भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के परिवारों को 25,000 रुपये की सीधी नकद सहायता और कर्नाटक की तरह विधानसभा का एक विशेष सत्र बुलाने की भी मांग की।
इनपुट: IANS



