तिहाड़ जेल अधीक्षक पर अवमानना की कार्यवाही, हाईकोर्ट ने कहा - 'कानूनी व्यवस्था का मज़ाक बनाया गया'
दिल्ली हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल के एक अधीक्षक के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की है। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि उसके स्पष्ट आदेश के बावजूद एक विचाराधीन कैदी को पैरोल पर रिहा…
दिल्ली हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल के एक अधीक्षक के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की है। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि उसके स्पष्ट आदेश के बावजूद एक विचाराधीन कैदी को पैरोल पर रिहा नहीं किया गया, जिसे कोर्ट ने 'कानूनी व्यवस्था का मजाक' और नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करार दिया है। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला तिहाड़ की सेंट्रल जेल-2 के अधीक्षक डॉ. पवन कुमार से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने डॉ. पवन कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। उन्हें 22 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला विचाराधीन कैदी अनवर हुसैन की याचिका से संबंधित है, जो पांच साल और पांच महीने से जेल में बंद है। हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट में कानूनी उपाय अपनाने के लिए आठ सप्ताह की पैरोल मांगी थी, लेकिन जेल प्रशासन ने उनका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
30 जुलाई को हाईकोर्ट ने हुसैन को चार सप्ताह की पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया था और जेल प्रशासन को इसके लिए आवश्यक शर्तें तय करने को कहा था। हालांकि, जेल अधिकारियों ने शर्तें तय ही नहीं कीं और आदेश के बावजूद कैदी को रिहा नहीं किया गया।
अदालत के आदेश की अनदेखी
इसके बाद हुसैन को अपने पैरोल आदेश का पालन करवाने के लिए दोबारा अदालत में अर्जी लगानी पड़ी। 11 अगस्त को हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश में संशोधन करते हुए पैरोल की शर्तें खुद ही तय कर दीं। लेकिन जब याचिकाकर्ता की पत्नी रिहाई की औपचारिकताएं पूरी करने जेल पहुंचीं, तो अधिकारियों ने यह कहते हुए आदेश मानने से इनकार कर दिया कि वे इसे तब तक लागू नहीं करेंगे जब तक कि यह सीधे हाईकोर्ट से प्राप्त न हो जाए।
इस पर अदालत ने कहा कि 11 अगस्त का आदेश एक डिजिटल हस्ताक्षर वाला सार्वजनिक दस्तावेज था, जिसकी प्रामाणिकता आसानी से जांची जा सकती थी। पीठ ने टिप्पणी की कि जेल प्रशासन ने रिहाई रोकने के लिए 'बेहद कमजोर और अनुचित' कारण दिया।
अधीक्षक की दलीलें खारिज
सुनवाई के दौरान जेल अधीक्षक डॉ. पवन कुमार ने दलील दी कि उनकी कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण नहीं थी और पैरोल से पहले पते का सत्यापन एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो पूरी नहीं हुई थी। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि 'सामान्य प्रक्रिया' जैसे शब्दों का सहारा लेकर अधीक्षक अपने अधिकारों के दुरुपयोग को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। अदालत ने कहा कि जेल प्रशासन के कमजोर बहानों के कारण याचिकाकर्ता के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मिले अधिकारों का हनन हुआ।
इनपुट: IANS



