रविवार, 2 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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जलवायु परिवर्तन का दोहरा संकट: भीषण गर्मी और बिजली की कमी से 2050 तक लाखों जानें जाने का खतरा

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में बढ़ती गर्मी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से जारी एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2050 तक भीषण गर्मी के कारण हर साल करीब…

जलवायु परिवर्तन का दोहरा संकट: भीषण गर्मी और बिजली की कमी से 2050 तक लाखों जानें जाने का खतरा
(फोटो: IANS)

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में बढ़ती गर्मी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही है। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से जारी एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2050 तक भीषण गर्मी के कारण हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान है। यह रिपोर्ट इस गंभीर समस्या के एक चिंताजनक पहलू को उजागर करती है — इसका सबसे ज़्यादा असर उन गरीब देशों पर पड़ेगा, जिनके पास एयर कंडीशनिंग जैसी कूलिंग सुविधाओं के लिए पर्याप्त बिजली और संसाधन नहीं हैं।

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सोमवार को जारी 'क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब' की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि गर्मी से होने वाली इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए लोगों तक ऊर्जा, खासकर ठंडक देने वाले उपकरणों के लिए जरूरी बिजली की पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार, जिन क्षेत्रों पर गर्मी की मार सबसे ज़्यादा पड़ने की आशंका है, वहीं के लोग आर्थिक रूप से इतने सक्षम नहीं हैं कि वे एयर कंडीशनर जैसी सुविधाओं का खर्च उठा सकें।

सबसे ज़्यादा जोखिम गरीब देशों पर

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाली मौतों में एक बड़ा असंतुलन देखने को मिलेगा। अनुमान है कि गर्मी से होने वाली कुल अतिरिक्त मौतों में से लगभग 10 गुना अधिक मौतें गरीब देशों में होंगी, जबकि अमीर देशों में यह आंकड़ा काफी कम रहेगा। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा, "एयर कंडीशनर लोगों की जान बचा सकता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण अमीर देशों में इसका इस्तेमाल निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि दुनिया के कई गरीब देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे।"

उन्होंने इस स्थिति को जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक बताया, क्योंकि सबसे ज्यादा मौतें उन्हीं देशों में होंगी, जिनका इस समस्या में योगदान सबसे कम रहा है। ग्रीनस्टोन के अनुसार, यह रिपोर्ट उन देशों के लिए एक चेतावनी है, जहां सस्ती और भरोसेमंद बिजली व्यवस्था स्थापित करने के लिए तत्काल काम करने की ज़रूरत है।

ऊर्जा की खपत में भारी असमानता

विश्लेषण के अनुसार, फिलहाल केवल दुनिया के सबसे अमीर देशों के पास ही बड़े पैमाने पर कूलिंग के लिए बिजली इस्तेमाल करने की क्षमता है। हालांकि, भविष्य में कई मध्यम आय वाले देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत होने से वहां बिजली की खपत बढ़ेगी। रिपोर्ट का अनुमान है कि मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत, कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना ज़्यादा बढ़ेगी। वहीं, कम आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति अतिरिक्त बिजली की खपत इतनी कम होगी कि उससे सिर्फ चार महीने तक एक एलईडी बल्ब ही जलाया जा सकेगा।

चिन्हित किए गए सबसे संवेदनशील क्षेत्र

रिपोर्ट में 18 देशों के ऐसे इलाकों की पहचान की गई है, जहां करीब 67.6 करोड़ लोग गर्मी और कूलिंग संसाधनों की कमी के दोहरे संकट का सामना करेंगे। इन क्षेत्रों में 2050 तक हर साल करीब 3.77 लाख मौतें होने का अनुमान है। सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड शामिल हैं। इसके अलावा दक्षिण एशिया में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार भी इस सूची में हैं।

इसकी तुलना अमीर खाड़ी देशों से की गई है, जहां तापमान तो उतना ही रहता है, लेकिन बिजली की बेहतर उपलब्धता के कारण गर्मी से होने वाली मौतें काफी कम रहने का अनुमान है। उदाहरण के लिए, 2050 तक नाइजर में प्रति व्यक्ति अतिरिक्त बिजली की खपत सऊदी अरब की तुलना में सिर्फ नौवां हिस्सा होगी, जिसके चलते नाइजर में गर्मी से हर साल करीब 27,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।

आगे की राह और समाधान

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के फेलो अश्विन रोडे ने कहा, "हमने उन इलाकों की पहचान की है, जहां गर्मी से सबसे ज्यादा मौतें होने का खतरा है और जहां लोगों के पास एयर कंडीशनर चलाने के लिए पर्याप्त बिजली भी नहीं होगी।" उन्होंने बताया कि इस जानकारी से सरकारों को यह तय करने में मदद मिलेगी कि लोगों की जान कैसे बचाई जाए। इसके लिए बिजली की बेहतर उपलब्धता, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और लक्षित सामाजिक योजनाएं जैसे कदम उठाने की जरूरत होगी।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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