मुंबई महानगर क्षेत्र की पानी की ज़रूरतों के लिए महाराष्ट्र सरकार की 25-वर्षीय योजना, उच्च-स्तरीय समिति का गठन
मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में भविष्य में पानी की किल्लत न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ी पहल की है। सरकार ने मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के लिए अगले 25 वर्षों की जल…
मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में भविष्य में पानी की किल्लत न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ी पहल की है। सरकार ने मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के लिए अगले 25 वर्षों की जल प्रबंधन योजना का मसौदा तैयार करने का फ़ैसला किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, इस काम के लिए एक उच्च-स्तरीय अध्ययन समूह का गठन किया गया है, जो तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।
यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि मुंबई महानगर क्षेत्र, जो देश का एक प्रमुख आर्थिक केंद्र है, लगातार बढ़ती आबादी, व्यावसायिक विस्तार और बड़ी परियोजनाओं के कारण पानी की बढ़ती मांग का सामना कर रहा है। फिलहाल यह क्षेत्र राज्य के बांधों और नगर निगमों के जल स्रोतों के मिले-जुले नेटवर्क पर निर्भर है, लेकिन सरकार का मानना है कि अब इस तरह का खंडित प्रबंधन कारगर नहीं रहेगा।
कौन करेगा योजना तैयार?
इस नवगठित अध्ययन समूह की अध्यक्षता जल संसाधन विभाग के सेवानिवृत्त सचिव संजय बेलसारे करेंगे। समिति में कोंकण क्षेत्र के मुख्य अभियंता (सदस्य सचिव) के अलावा बीएमसी, एमएमआरडीए, ठाणे, नवी मुंबई और कल्याण-डोंबिवली के आयुक्तों को भी शामिल किया गया है। साथ ही, महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC), महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण (MJP) और महाराष्ट्र रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर (MRSAC) के प्रतिनिधि भी इसका हिस्सा होंगे ताकि विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित हो सके।
सिर्फ़ बांध नहीं, समाधान व्यापक होगा
विशेषज्ञों का यह पैनल सिर्फ़ नए बांध बनाने जैसे पारंपरिक उपायों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पानी के प्रबंधन के आधुनिक और टिकाऊ तरीकों पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। समिति के प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:
- मांग का आकलन: घरेलू, औद्योगिक, वाणिज्यिक और निर्माण क्षेत्रों का ऑडिट करके वर्ष 2031, 2041 और 2051 के लिए पानी की सटीक मांग का अनुमान लगाना।
- आपूर्ति की समीक्षा: मौजूदा, निर्माणाधीन और प्रस्तावित जल आपूर्ति परियोजनाओं की समीक्षा करना।
- नए स्रोतों की खोज: अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग, बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण जैसे उपायों का मूल्यांकन करना।
- बर्बादी पर रोक: पानी के रिसाव और बर्बादी (गैर-राजस्व जल) को कम करने के लिए कड़े उपायों की सिफ़ारिश करना।
- जलवायु परिवर्तन का असर: मानसून के बदलते पैटर्न, अत्यधिक बारिश, लंबे सूखे और समुद्र के बढ़ते जलस्तर के प्रभावों का आकलन करना।
अध्ययन समूह अपनी अंतिम रिपोर्ट 'एकीकृत जल सुरक्षा योजना 2051' के रूप में प्रस्तुत करेगा। इसमें प्राथमिकता वाली परियोजनाओं, अनुमानित खर्च, कार्यान्वयन की समय-सीमा और विभिन्न विभागों की ज़िम्मेदारियों का स्पष्ट उल्लेख होगा। इस व्यापक रणनीति का उद्देश्य अगले पच्चीस वर्षों तक पूरे क्षेत्र में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखना है।
इनपुट: IANS



