गुरूवार, 2 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
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शैव-वैष्णव टिप्पणी मामला: DMK नेता पोनमुडी को हाईकोर्ट से राहत नहीं, आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और DMK के वरिष्ठ नेता के. पोनमुडी को शैव, वैष्णव और महिलाओं पर की गई एक विवादित टिप्पणी के मामले में मद्रास हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, हा

शैव-वैष्णव टिप्पणी मामला: DMK नेता पोनमुडी को हाईकोर्ट से राहत नहीं, आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और DMK के वरिष्ठ नेता के. पोनमुडी को शैव, वैष्णव और महिलाओं पर की गई एक विवादित टिप्पणी के मामले में मद्रास हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, हाईकोर्ट ने गुरुवार को उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिससे निचली अदालत में मुकदमा जारी रहने का रास्ता साफ हो गया है।

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यह पूरा मामला अप्रैल 2025 में चेन्नई के एक कार्यक्रम में दिए गए पोनमुडी के भाषण से जुड़ा है, जब वे राज्य के वन मंत्री के पद पर थे। ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन की भाजपा पार्षद उमा आनंदन ने इस भाषण के खिलाफ एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी।

क्या है पूरा मामला?

उमा आनंदन ने अपनी शिकायत में कहा कि उन्होंने यूट्यूब पर पोनमुडी के भाषण का एक वीडियो देखा, जिसमें की गई टिप्पणियां बेहद आपत्तिजनक थीं। उनके मुताबिक, पोनमुडी ने शैवों द्वारा लगाए जाने वाले क्षैतिज चिह्न 'पट्टाई' और वैष्णवों के ऊर्ध्वाधर चिह्न 'तिरुमन' की तुलना "एक यौनकर्मी द्वारा यौन मुद्राओं के वर्णन" से की थी।

शिकायतकर्ता ने इसे घृणास्पद भाषण बताते हुए आरोप लगाया कि इन टिप्पणियों से दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची और सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने की आशंका पैदा हुई। भाजपा पार्षद ने पहले पुलिस में शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट का रुख किया।

अदालती कार्यवाही का क्रम

उमा आनंदन की निजी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए चेन्नई के जॉर्ज टाउन स्थित तृतीय मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इस साल की शुरुआत में पोनमुडी को 23 फरवरी 2026 के लिए समन जारी किया था। DMK नेता ने इसी आदेश को रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।

पोनमुडी के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल ने केवल किसी और व्यक्ति द्वारा सालों पहले कही गई बात को दोहराया था और ये उनके अपने विचार नहीं थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह मामला भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत नहीं आता है। हालांकि, जस्टिस जीके इलानथिरायण ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और निचली अदालत में मामले की सुनवाई जारी रखने की अनुमति दे दी।

इनपुट: IANS

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