गुरूवार, 23 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
देश

मुख्यमंत्री को धमकी का मामला: DMK विधायक मार्कंडेयन की रिमांड को चुनौती, मद्रास हाईकोर्ट करेगा तत्काल सुनवाई

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को कथित तौर पर धमकी देने के मामले में न्यायिक हिरासत में भेजे गए DMK विधायक जी.वी. मार्कंडेयन की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट तत्काल सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। समाचार एजेंसी…

मुख्यमंत्री को धमकी का मामला: DMK विधायक मार्कंडेयन की रिमांड को चुनौती, मद्रास हाईकोर्ट करेगा तत्काल सुनवाई
(फोटो: IANS)

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री को कथित तौर पर धमकी देने के मामले में न्यायिक हिरासत में भेजे गए DMK विधायक जी.वी. मार्कंडेयन की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट तत्काल सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, विधायक ने अपनी न्यायिक रिमांड को चुनौती दी है, जिस पर गुरुवार को न्यायमूर्ति जी.के. इलंथिरैयन ने दोपहर के सत्र में सुनवाई के लिए सहमति दे दी।

विज्ञापन

मार्कंडेयन, जो विलाथिकुलम विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, 20 जुलाई से न्यायिक हिरासत में हैं। उन्हें 3 अगस्त तक के लिए रिमांड पर भेजा गया है। उन्होंने अपनी याचिका में 20 जुलाई के तूतीकोरिन न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत के रिमांड आदेश को रद्द करने और खुद को जमानत पर रिहा करने की मांग की है।

गिरफ्तारी और आरोप

यह पूरा मामला 18 जुलाई को कोविलपट्टी में DMK की एक जनसभा में दिए गए भाषण से जुड़ा है। तूतीकोरिन जिला अपराध शाखा (DCB) ने एस. बालासुब्रमणियन की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए विधायक को गिरफ्तार किया था। शिकायत में आरोप है कि मार्कंडेयन ने कहा था कि DMK विधायक विधानसभा के अंदर मुख्यमंत्री विजय की "हड्डियां तोड़ देंगे"।

इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी), 352 (शांति भंग के इरादे से अपमान) और 353(2) (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान) के तहत FIR दर्ज की थी।

कानूनी सुरक्षा का उल्लंघन?

अपनी याचिका में विधायक ने दलील दी है कि उनकी गिरफ्तारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मिले कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि पुलिस यह बताने में विफल रही कि उनकी गिरफ्तारी क्यों जरूरी थी, जबकि उन्हें BNSS की धारा 41A के तहत नोटिस देकर भी पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता था।

मार्कंडेयन ने सुप्रीम कोर्ट के 'अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014)' और 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI (2022)' के फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों में यह स्थापित किया गया है कि सात साल तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी के बजाय पहले नोटिस जारी किया जाना चाहिए, जब तक कि कोई विशेष परिस्थिति न हो। उनका कहना है कि जांच एजेंसी मजिस्ट्रेट के सामने गिरफ्तारी की जरूरत साबित करने के लिए कोई ठोस आधार पेश नहीं कर सकी।

इनपुट: IANS

N

News4Social नेशनल डेस्क

News4Social नेशनल डेस्क — IANS समेत लाइसेंस-प्राप्त समाचार एजेंसियों की फीड से राष्ट्रीय घटनाक्रम से जुड़ी ताज़ा व प्रामाणिक खबरें संपादकीय समीक्षा के बाद प्रकाशित करता है। हर खबर उसके स्रोत के श्रेय (credit) के साथ दी जाती है। सभी लेख देखें →

आगे पढ़ें

और देखें →