पाकिस्तानी मानवाधिकार वकीलों की गिरफ़्तारी: अमेरिका-ब्रिटेन के शिक्षाविदों ने तत्काल रिहाई की मांग की
अमेरिका और ब्रिटेन के शीर्ष विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों ने दो मानवाधिकार वकीलों, इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा की हिरासत पर गंभीर चिंता जताई है। समाचार एजेंसी…
अमेरिका और ब्रिटेन के शीर्ष विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों ने दो मानवाधिकार वकीलों, इमान जैनब मजारी-हाजिर और हादी अली चट्ठा की हिरासत पर गंभीर चिंता जताई है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन विद्वानों ने वकीलों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों को वापस लेने और उनकी तत्काल रिहाई की मांग करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया है। उन्होंने इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन पर हमला बताया है।
इन दोनों वकीलों को कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना करने वाली सोशल मीडिया पोस्ट के लिए इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम अधिनियम (PECA) के तहत जनवरी 2026 में 17 साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी। हालांकि, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को उनकी सज़ा निलंबित कर उन्हें ज़मानत दे दी थी। लेकिन, कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने उन्हें एक दूसरे मामले में फिर से हिरासत में ले लिया, और वे तब से हिरासत में हैं।
कानून के दुरुपयोग का आरोप
शिक्षाविदों ने अपने बयान में पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बावजूद वकीलों को फिर से जेल में रखना एक सोची-समझी साज़िश है। बयान में कहा गया, “आपराधिक कानून का इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने या अपनी कानूनी पैरवी के कारण वकीलों को डराने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।”
पाकिस्तान के अख़बार डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षाविदों ने इमान मजारी के काम को रेखांकित किया, जिन्होंने जबरन गुमशुदगी के मामलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और पीड़ितों का प्रतिनिधित्व किया। वहीं, हादी चट्ठा ने ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे लोगों और मौत की सज़ा पाए कैदियों का बचाव किया है।
अंतरराष्ट्रीय दायित्वों की याद दिलाई
बयान पर हस्ताक्षर करने वालों ने पाकिस्तान सरकार को उसके अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की वाचा (आईसीसीपीआर) के तहत दायित्वों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि इस वाचा का पक्षकार होने के नाते पाकिस्तान की ज़िम्मेदारी है कि वह राज्य के संस्थानों की आलोचना करने के अधिकार की रक्षा करे। उनके अनुसार, सोशल मीडिया टिप्पणी के लिए 17 साल की सज़ा देना इस ज़िम्मेदारी के बिल्कुल ख़िलाफ़ है।
इन शिक्षाविदों ने पाकिस्तान की संघीय सरकार, न्यायपालिका और अन्य सरकारी संस्थानों से अपील की है कि वे देश के संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का पालन करें। हस्ताक्षर करने वालों में आयशा सिद्दीका, फहद हमायूं, रजा रूमी और यूनुस समद जैसे प्रमुख विद्वान शामिल हैं।
इनपुट: IANS



