बुधवार, 9 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
टेक्नोलॉजी

भारत को 2032 तक चाहिए होगी 8 गुना ज़्यादा एनर्जी स्टोरेज, 4 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान

भारत के पावर सेक्टर में एक बड़े बदलाव की तैयारी हो रही है। देश में रिन्यूएबल यानी अक्षय ऊर्जा का उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन उसे ग्रिड से जोड़ने और बिजली की मांग को संतुलित करने की चुनौती भी बड़ी…

भारत को 2032 तक चाहिए होगी 8 गुना ज़्यादा एनर्जी स्टोरेज, 4 लाख करोड़ के निवेश का अनुमान
(फोटो: IANS)

भारत के पावर सेक्टर में एक बड़े बदलाव की तैयारी हो रही है। देश में रिन्यूएबल यानी अक्षय ऊर्जा का उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन उसे ग्रिड से जोड़ने और बिजली की मांग को संतुलित करने की चुनौती भी बड़ी होती जा रही है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को वित्त वर्ष 2032 तक अपनी ऊर्जा भंडारण (Energy Storage) क्षमता को मौजूदा स्तर से करीब आठ गुना बढ़ाकर 411 गीगावाट-घंटे (GWh) तक ले जाना होगा।

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केयरएज रेटिंग्स की मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 तक देश की ऑपरेशनल स्टोरेज क्षमता लगभग 54 गीगावाट-घंटे थी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगले छह सालों में 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के भारी-भरकम निवेश की ज़रूरत होगी, जो इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के लिए एक बड़ा अवसर पैदा करेगा।

क्यों ज़रूरी है एनर्जी स्टोरेज?

भारत में सौर और पवन ऊर्जा जैसे गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी कुल स्थापित क्षमता में 50% तक पहुँच गई है, लेकिन बिजली उत्पादन में इनका योगदान महज़ 29% है। इसकी मुख्य वजह इन स्रोतों का अनियमित होना और इनका प्लांट लोड फैक्टर (PLF) कम होना है। एनर्जी स्टोरेज सिस्टम इसी समस्या का समाधान है। यह दिन के समय पैदा हुई अतिरिक्त सौर ऊर्जा को स्टोर करता है और शाम को जब बिजली की मांग चरम पर होती है, तब उसे सप्लाई करता है। इससे ग्रिड को स्थिर रखने, बिजली कटौती कम करने और मांग के उतार-चढ़ाव (रैम्पिंग) को संभालने में मदद मिलती है।

ग्रिड पर बढ़ता दबाव और 'डक कर्व'

रिपोर्ट में बताया गया है कि सौर ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता से 'डक कर्व' की समस्या गहरी हो रही है। यह वह स्थिति है जब दिन में सौर ऊर्जा की अधिकता से ग्रिड पर नेट लोड बहुत कम हो जाता है और शाम को सूरज ढलते ही तेज़ी से बढ़ता है। आंकड़ों के अनुसार, सुबह के समय बिजली की मांग में गिरावट (रैम्प-डाउन) मई 2025 के लगभग 28 गीगावाट से बढ़कर मई 2026 में करीब 50 गीगावाट हो गई। वहीं, शाम के समय मांग में तेज़ बढ़ोतरी (रैम्प-अप) 68 गीगावाट से बढ़कर लगभग 80 गीगावाट हो गई। यह रुझान पारंपरिक बिजली संयंत्रों पर दबाव डाल रहा है और अक्षय ऊर्जा की बर्बादी का कारण बन रहा है। ट्रांसमिशन और ग्रिड स्थिरता की चिंताओं के कारण वित्त वर्ष 2027 के पहले तीन महीनों (3MFY27) में लगभग 8.1 टेरावाट-घंटे (TWh) सौर बिजली की कटौती की गई।

निवेश और भविष्य की राह

केयरएज रेटिंग्स के ईडी और सीआरओ सचिन गुप्ता ने कहा, "भारत का पावर सेक्टर रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने की चुनौती से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करने की ओर बढ़ रहा है कि रिन्यूएबल बिजली को ग्रिड में प्रभावी ढंग से जोड़ा जा सके। जैसे-जैसे सोलर और विंड क्षमता बढ़ेगी, अतिरिक्त ऊर्जा को स्टोर करने और पीक डिमांड के समय उसका इस्तेमाल करने की क्षमता अहम हो जाएगी।"

इस दिशा में सरकार की सक्रियता भी बढ़ी है। स्टोरेज आधारित टेंडर प्रक्रिया में तेज़ी आई है, जो वित्त वर्ष 2025 के 7 गीगावाट के मुकाबले वित्त वर्ष 2026 में लगभग 21 गीगावाट तक पहुँच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप्ड स्टोरेज प्लांट (PSP), दोनों प्रौद्योगिकियाँ इस लक्ष्य को पाने में अहम भूमिका निभाएंगी। BESS को तेज़ी से लगाया जा सकता है, जबकि PSP लंबे समय तक स्टोरेज और ज़्यादा टिकाऊपन जैसे फायदे देते हैं। रेटिंग एजेंसी ने अनुमान लगाया है कि दोनों तकनीकों से ऊर्जा स्टोर करने की लागत लगभग 4.5 से 5 रुपये प्रति यूनिट आएगी।

इनपुट: IANS

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News4Social टेक डेस्क

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