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भारत-अमेरिका साझेदारी: रणनीतिक लक्ष्यों पर मतभेद के बावजूद रिश्ते क्यों अहम हैं?

भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर कुछ गहरे मतभेद उभर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों की साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वॉशिंगटन और नई…

भारत-अमेरिका साझेदारी: रणनीतिक लक्ष्यों पर मतभेद के बावजूद रिश्ते क्यों अहम हैं?
(फोटो: IANS)

भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर कुछ गहरे मतभेद उभर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों की साझेदारी लगातार आगे बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच साझेदारी की परिभाषा को लेकर बुनियादी असहमति है, जो रूस, ईरान और चीन जैसे देशों से निपटने के तरीकों में साफ दिखती है।

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समाचार एजेंसी IANS के हवाले से आई इस रिपोर्ट में भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव के एक लेख का जिक्र है। 'इंडिया नैरेटिव' में उन्होंने लिखा कि वॉशिंगटन अक्सर रणनीतिक तालमेल को राजनीतिक सहमति की मांग का आधार बनाता है। वहीं, भारत के लिए साझेदारी का मतलब दो संप्रभु देशों के बीच सहयोग है, जहाँ आपसी मतभेद बने रह सकते हैं। राव ने चेताया, “जब ये मतभेद वफादारी की सार्वजनिक परीक्षा बन जाते हैं तो कूटनीति की जगह दिखावा ले लेता है। समझौता करना इसलिए और मुश्किल हो जाता है क्योंकि इसे घुटने-टेकने जैसा दिखाया जाता है।”

साझेदारी की बुनियाद और चुनौतियाँ

पिछले 25 सालों से भारत-अमेरिका संबंध इस विश्वास पर टिके थे कि एक मजबूत भारत, एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने और एक स्वतंत्र इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देने में अमेरिकी हितों को पूरा करेगा। इसी व्यापक समझ के चलते छोटे-मोटे मतभेदों को नजरअंदाज किया जाता रहा, लेकिन अब इस धारणा को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।

निरुपमा राव के अनुसार, नई दिल्ली ने अमेरिका की उस पुरानी सोच से बाहर निकलने में कई साल लगाए हैं, जिसमें भारत और पाकिस्तान को एक ही नजरिए से देखा जाता था। उन्होंने कहा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा मध्यस्थता की पेशकश ने उस पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया था। राव कहती हैं, “भारत के वैश्विक आर्थिक, तकनीकी और समुद्री हित हैं, जिन्हें सिर्फ पड़ोसी देश के साथ झगड़े के संकीर्ण नजरिए से नहीं समझा जा सकता।”

भारत का स्पष्ट रुख और भविष्य की दिशा

रिपोर्ट में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की न्यूयॉर्क में की गई हालिया टिप्पणी का भी उल्लेख किया गया है। उन्होंने एशिया सोसाइटी में कहा था कि भारत अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि सुरक्षा संबंधी प्रमुख चिंताओं को न समझने से रिश्तों पर असर पड़ सकता है।

अंत में, रिपोर्ट यह सुझाव देती है कि भारत की प्रतिक्रिया आहत राष्ट्रवाद से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। निरुपमा राव के अनुसार, रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा बाहरी दबाव की निंदा करने में नहीं, बल्कि उसका प्रभावी ढंग से सामना करने में है। इसके लिए बेहतर रक्षा आपूर्ति, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी क्षमता और विनिर्माण शक्ति की जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एशिया में शक्ति संतुलन के लिए भारत को अमेरिकी तकनीक और निवेश की जरूरत है, जबकि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका को एक मजबूत भारत चाहिए।

इनपुट: IANS

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