नेपाल की 800 साल पुरानी विरासत जर्मनी से लौटी, राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंपे गए ऐतिहासिक दस्तावेज़
नेपाल की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत से जुड़े 800 से अधिक अनमोल ऐतिहासिक दस्तावेज़ जर्मनी से स्वदेश लौट आए हैं। इनमें से कुछ दस्तावेज़ 13वीं सदी के हैं। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार…
नेपाल की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत से जुड़े 800 से अधिक अनमोल ऐतिहासिक दस्तावेज़ जर्मनी से स्वदेश लौट आए हैं। इनमें से कुछ दस्तावेज़ 13वीं सदी के हैं। समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के अनुसार, काठमांडू में शुक्रवार को आयोजित एक समारोह में इन महत्वपूर्ण सामग्रियों को औपचारिक रूप से नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंप दिया गया।
यह पूरा संग्रह जर्मनी के एक निजी संग्रहालय में संरक्षित था, जिसे अब नेपाल वापस लाया गया है। इसमें प्राचीन ताड़पत्रों पर लिखी पांडुलिपियाँ, शाही फ़रमान, अदालती आदेश, संस्कृत ग्रंथ और कई ऐतिहासिक यात्रा विवरण शामिल हैं। ये सभी दस्तावेज़ नेपाल की सभ्यता, शासन और बौद्धिक इतिहास की गहरी जानकारी देते हैं।
कैसे संभव हुई यह वापसी?
यह संग्रह दिवंगत जोसेफ पीटर रिंडफ्लेश के निजी संग्रह का हिस्सा था, जिन्होंने इसे 1780 से 1990 के दशक के बीच नेपाल से एकत्र किया था। उनकी इच्छा थी कि ये दस्तावेज़ नेपाल लौट जाएँ। उनके बेटे वाल्टर रिंडफ्लेश ने यह संग्रह हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एक्सेल माइकल्स को सौंपा। प्रोफेसर माइकल्स, डॉ. माणिक बज्राचार्य और राजन खतीवड़ा ने मिलकर इन दस्तावेज़ों को नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल को सौंपा। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, वाल्टर रिंडफ्लेश और प्रोफेसर माइकल्स की मित्रता ने इस वापसी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई।
संग्रह में क्या-क्या है?
हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी द्वारा तैयार कैटलॉग के अनुसार, इस संग्रह में 800 से ज़्यादा शाही और आधिकारिक दस्तावेज़ हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- मल्ल काल: लाल मोहर लगे दस्तावेज़ों सहित 465 ताड़पत्र पांडुलिपियाँ। इनमें से कुछ को नेपाल में बचे सबसे पुराने दस्तावेज़ों में से एक माना जाता है।
- शाह और राणा काल: मिट्टी की मुहरों वाले दस्तावेज़ों सहित 312 कानूनी फ़रमान और शाही पत्र।
- अन्य सामग्री: राणा प्रधानमंत्रियों के कार्यालयों से जुड़ी 18 पांडुलिपियाँ, यात्रा डायरियाँ और 11 अन्य पांडुलिपियाँ।
सांस्कृतिक अधिकारों की बहाली
इस अवसर पर विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा, "इन दस्तावेज़ों की वापसी नेपाल के सांस्कृतिक अधिकारों और उसकी सभ्यतागत विरासत पर संप्रभु स्वामित्व की बहाली का प्रतीक है।" उन्होंने कहा कि नेपाल की कला, साहित्य, परंपराएं और धार्मिक ग्रंथ केवल भौतिक अवशेष नहीं हैं, बल्कि उसकी सभ्यता की जीवंत आत्मा हैं। खनाल ने इन ऐतिहासिक सामग्रियों की पहचान, सूचीकरण और वापसी में प्रोफेसर माइकल्स और उनकी टीम के अकादमिक प्रयासों की भी सराहना की।
यह स्वदेश वापसी नेपाल के जर्मनी स्थित दूतावास, हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी, हीडलबर्ग एकेडमी ऑफ साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज, सराफ फाउंडेशन और नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार के संयुक्त प्रयासों से संभव हुई। मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि यह कदम 1970 के यूनेस्को कन्वेंशन के सिद्धांतों के प्रति नेपाल और जर्मनी की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो सांस्कृतिक संपत्ति के अवैध हस्तांतरण को रोकता है।
इनपुट: IANS



