अंडे के गढ़ नमक्कल में लागत बढ़ी, मुनाफा घटा: मक्के की महंगाई और एथेनॉल की मांग ने तोड़ी मुर्गी पालकों की कमर
देश के सबसे बड़े अंडा उत्पादक क्षेत्रों में से एक, तमिलनाडु के नमक्कल में मुर्गी पालक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। उनके लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि मुर्गी दाने (पोल्ट्री फीड)…
देश के सबसे बड़े अंडा उत्पादक क्षेत्रों में से एक, तमिलनाडु के नमक्कल में मुर्गी पालक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। उनके लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि मुर्गी दाने (पोल्ट्री फीड) में इस्तेमाल होने वाले मक्के और अन्य जरूरी सप्लीमेंट्स की कीमतें आसमान छू रही हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभूतपूर्व मूल्य वृद्धि के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की बढ़ती मांग एक बड़ा कारण बनकर उभरी है।
किसानों का कहना है कि वे हर अंडे पर लगभग 30 पैसे और हर किलो ब्रॉयलर चिकन पर करीब 30 रुपये का सीधा नुकसान उठा रहे हैं। मौजूदा समय में एक अंडे की उत्पादन लागत करीब 5.50 रुपये आती है, जबकि उन्हें फार्म पर केवल 5.20 रुपये ही मिल पा रहे हैं। इसी तरह, ब्रॉयलर चिकन को पालने की लागत 110 रुपये प्रति किलोग्राम है, लेकिन उसकी बिक्री सिर्फ 80 रुपये में हो रही है।
चारा महंगा, मुनाफा गायब
इस संकट के केंद्र में मक्का है, जो मुर्गी दाने का मुख्य घटक है। एक साल पहले 22 रुपये प्रति किलो बिकने वाला मक्का अब करीब 30 रुपये किलो पर पहुंच गया है। मुर्गी पालकों का मानना है कि एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों द्वारा मक्के की भारी खरीद के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। नमक्कल का पोल्ट्री उद्योग अपनी मक्के की जरूरत के लिए मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक पर निर्भर है। किसानों ने कुछ व्यापारियों पर कृत्रिम कमी पैदा करने के लिए जानबूझकर माल रोकने का भी आरोप लगाया है।
सिर्फ मक्का ही नहीं, चारे में इस्तेमाल होने वाले अन्य पूरक आहार भी बहुत महंगे हो गए हैं:
- सोया: कीमत 30 रुपये से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलो हो गई है।
- फॉस्फोरस: चीन से आयात होने वाले इस खनिज की कीमत 30 रुपये से तीन गुना बढ़कर 90 रुपये प्रति किलो हो गई है।
- अमीनो एसिड: लाइसिन और मेथियोनीन जैसे जरूरी तत्व, जो पहले 150 रुपये किलो थे, अब 800 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं।
उद्योग के जानकारों के अनुसार, खाड़ी युद्ध से जुड़े व्यवधानों के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ने से चीन से आयात होने वाले इन सप्लीमेंट्स की कीमतें बढ़ी हैं।
बाजार से भी नहीं मिल रही राहत
लागत में भारी इजाफे के बावजूद किसानों को बाजार से राहत नहीं मिल रही है। फिलहाल श्रावण मास के चलते अंडों की मांग कमजोर है, क्योंकि इस दौरान बहुत से लोग मांसाहारी भोजन से परहेज करते हैं। किसानों को उम्मीद है कि सर्दियों में खपत बढ़ने से कीमतें सुधरेंगी, लेकिन अगर चारे की लागत इसी तरह बढ़ती रही तो इस क्षेत्र का वित्तीय संकट और गहरा सकता है।
इनपुट: IANS



