पश्चिमी घाट: केरल ने केंद्र से ‘पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र’ की सीमाएं फिर से तय करने की मांग की
पश्चिमी घाट के प्रस्तावित ‘पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र’ (ESA) के दायरे को लेकर केरल और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का दौर जारी है। केरल सरकार अपनी आबादी, खेती की ज़मीन और बागानों को इस…
पश्चिमी घाट के प्रस्तावित ‘पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र’ (ESA) के दायरे को लेकर केरल और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का दौर जारी है। केरल सरकार अपनी आबादी, खेती की ज़मीन और बागानों को इस संरक्षित क्षेत्र से पूरी तरह बाहर रखने की कोशिशों में जुटी है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, राज्य एक नया प्रस्ताव तैयार कर रहा है, जिसमें केंद्र से प्रस्तावित ESA के क्षेत्रफल में और कमी करने की मांग की जाएगी।
यह पूरा मामला कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ था, जिसमें मूल रूप से केरल के 123 गांवों को मिलाकर कुल 13,108 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ESA घोषित करने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ, क्योंकि लोगों को डर था कि इससे उनके घर और खेती-बाड़ी प्रभावित होंगे।
राज्य की प्रमुख मांगें और अब तक की कार्यवाही
व्यापक विरोध के बाद केरल ने अपने स्तर पर ओमेन वी. ओमेन समिति से एक अध्ययन कराया और अपनी सिफारिशें केंद्र को भेजीं। इसके बाद मार्च 2014 में केंद्र सरकार ने एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें प्रस्तावित क्षेत्र को घटाकर 9,993.7 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया। इसमें 9,107 वर्ग किलोमीटर वन और 886.7 वर्ग किलोमीटर गैर-वन क्षेत्र शामिल था।
हालांकि, केरल सरकार लगातार यह मांग करती रही है कि आबादी वाले क्षेत्रों, कृषि भूमि और बागानों को इस दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाए। बाद में राज्य ने एक और प्रस्ताव दिया, जिसमें क्षेत्र को और घटाकर 8,590.69 वर्ग किलोमीटर (98 गांव) करने की मांग की गई। केंद्र द्वारा अतिरिक्त जानकारी मांगे जाने पर राज्य ने सभी स्थानिक फाइलें और डेटा मुहैया कराया। इसके बावजूद, हालिया ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में राज्य के सुझाए गए बदलावों को शामिल नहीं किया गया।
संतुलन बनाने की चुनौती
केरल सरकार अब एक बार फिर विस्तृत प्रस्ताव के साथ केंद्र से संपर्क करने की तैयारी में है। राज्य के पर्यावरण मंत्री सनी जोसेफ ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि सरकार लोगों, विशेषकर किसानों के हितों की रक्षा करने और पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है। एक विभागीय रिपोर्ट में 33 गांवों को ESA के दायरे से पूरी तरह बाहर रखने का प्रस्ताव भी तैयार किया जा चुका है।
इस मुद्दे पर केंद्र के वरिष्ठ अधिकारियों और राज्य सरकार के बीच उच्च-स्तरीय बैठकें भी हुई हैं, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री वी.डी. सतीसन ने की। केरल का तर्क है कि उसकी भौगोलिक स्थिति अन्य राज्यों से अलग है, जहां ज़मीन कम, जनसंख्या घनत्व अधिक है और जंगल के साथ-साथ घनी मानव बस्तियां मौजूद हैं। राज्य का यह भी कहना है कि वहां पहले से ही कड़े पर्यावरण कानून लागू हैं। ऐसे में सरकार के सामने पर्यावरण संरक्षण और लोगों की आजीविका के बीच संतुलन साधना एक बड़ी चुनौती है।
इनपुट: IANS



