वैश्विक तनावों के बीच कूटनीति अब 'एक्सट्रीम स्पोर्ट' जैसा जोखिम भरा खेल: एस. जयशंकर
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को बेहद चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा है कि आज की दुनिया में कूटनीति एक 'एक्सट्रीम स्पोर्ट' यानी जोखिम भरे खेल जैसी हो गई है। उनके अनुसार…
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को बेहद चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा है कि आज की दुनिया में कूटनीति एक 'एक्सट्रीम स्पोर्ट' यानी जोखिम भरे खेल जैसी हो गई है। उनके अनुसार, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, युद्ध और आर्थिक दबावों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को इस तरह बदल दिया है कि राजनयिकों को पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हालात का सामना करना पड़ रहा है।
न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, जयशंकर ने कहा कि देश अब एक-दूसरे पर अपनी निर्भरता को ही दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। समाचार एजेंसी IANS के हवाले से उन्होंने इसे 'हमारे समय का विरोधाभास' बताया, जहां देश गहरे जुड़े होने के बावजूद एक-दूसरे के खिलाफ इसी जुड़ाव का फायदा उठाने को तैयार रहते हैं। उन्होंने कहा, "एक-दूसरे पर निर्भरता हकीकत है, जबकि प्रतिस्पर्धा आज की सोच है।"
बढ़ता दबाव और नए हथियार
जयशंकर ने दुनिया में चल रहे दो बड़े संघर्षों, पश्चिम एशिया में उथल-पुथल और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में लड़ाई का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन तनावों के कारण भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्तीय व्यवस्था पर भारी दबाव है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन भी पहले से अधिक असुरक्षित हो गई है।
उन्होंने उन 'चोक पॉइंट्स' का भी जिक्र किया, जिनके जरिए कोई देश दूसरे पर दबाव बना सकता है। इनमें महत्वपूर्ण भौगोलिक रास्ते, प्रतिबंध, यात्रा पर रोक और बाजारों तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल हैं। जयशंकर के मुताबिक, जिन देशों के पास इन पर नियंत्रण है, वे अब अपने प्रतिस्पर्धियों के खिलाफ इसका इस्तेमाल करने से हिचक नहीं रहे हैं।
नई तकनीक और बदलती सोच
विदेश मंत्री ने कहा कि ऊर्जा और सैन्य टेक्नोलॉजी में हुए बदलावों ने भी देशों के फैसलों को प्रभावित किया है। ऊर्जा क्षेत्र में किसी भी रुकावट से कीमतें बढ़ जाती हैं, जबकि सैन्य प्रौद्योगिकी में तरक्की कुछ देशों में जोखिम लेने का भरोसा बढ़ा सकती है। उन्होंने इस मानसिकता को 'यूज इट ऑर लूज इट' (इस्तेमाल करो या गंवा दो) वाली सोच बताया, जो पुराने समय की संतुलनकारी नीति से अलग है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की जरूरत
जयशंकर ने बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी बात की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पुराने समय में बने अंतरराष्ट्रीय संस्थान आज की हकीकत के हिसाब से खुद को ढाल पाएंगे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि इसकी शुरुआत सिर्फ 51 सदस्य देशों से हुई थी और आज की दुनिया उससे बहुत अलग है। उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह मौजूदा वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को कितना बदलता है।
हालांकि, इन चुनौतियों के बावजूद जयशंकर ने कहा, "मैं दुनिया को लेकर निराशावादी नहीं हूं।" उन्होंने विश्वास जताया कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बाद भी देशों के हित में यही है कि वे आपस में स्थिर और भरोसेमंद व्यवस्थाएं कायम करें।
इनपुट: IANS



