शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 · नई दिल्ली
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बांग्लादेश की जेलों में चिंताजनक वृद्धि: साढ़े आठ महीने में 132 कैदियों की मौत, मानवाधिकार पर गंभीर सवाल

बांग्लादेश की जेलों में कैदियों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे जेलों की स्थिति और कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के…

बांग्लादेश की जेलों में चिंताजनक वृद्धि: साढ़े आठ महीने में 132 कैदियों की मौत, मानवाधिकार पर गंभीर सवाल
(फोटो: IANS)

बांग्लादेश की जेलों में कैदियों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे जेलों की स्थिति और कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के पहले साढ़े आठ महीनों में ही देश की विभिन्न जेलों में कम से कम 132 कैदियों ने दम तोड़ दिया है। यह स्थिति जेलों में भीड़, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और व्यवस्था की जवाबदेही पर कई सवाल खड़े करती है।

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आंकड़ों के मुताबिक, कई बार तो एक ही दिन में चार-चार कैदियों की मौत की खबरें सामने आई हैं। हालिया मामलों में, 54 वर्षीय मोहम्मद रफीकुल इस्लाम और 60 वर्षीय अब्दुर रहीम की ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मृत्यु हो गई। इससे ठीक एक दिन पहले ढाका सेंट्रल जेल के दो और कैदियों, अब्दुल बारेक और अब्दुल माबूद की भी मौत हो गई थी।

मानवाधिकार संगठनों के आंकड़े और चिंताएं

ढाका स्थित मानवाधिकार संगठन 'आइन ओ सालिश केंद्र' (ASK) ने जनवरी से अगस्त के बीच 79 कैदियों की मौत दर्ज की है। इनमें 47 विचाराधीन कैदी थे जबकि 32 सज़ायाफ्ता थे। संगठन के मुताबिक, सबसे ज़्यादा 44 मौतें ढाका डिवीजन में हुईं। वहीं, मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए प्रेसेंजा इंटरनेशनल प्रेस एजेंसी ने बताया कि सिर्फ़ सितंबर के पहले 15 दिनों में ही बीमारियों के कारण कम से कम 10 कैदियों की मौत हुई, जिससे इस साल का कुल आंकड़ा 132 तक पहुंच गया है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि अलग-अलग स्रोतों के आंकड़ों में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन यह पैटर्न एक गंभीर सवाल ज़रूर उठाता है कि बीमार पड़ने पर कैदियों को समय पर इलाज मिल पाता है या नहीं और क्या उनके परिवारों को सूचित किया जाता है।

विशेषज्ञों की राय और जवाबदेही का सवाल

मानवाधिकार कार्यकर्ता इन मौतों की गहन और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। ASK के वरिष्ठ समन्वयक, अबू अहमद फैजुल कबीर ने कहा, "कैदी अपनी आजादी खो सकते हैं, लेकिन वे अपनी मानवीय गरिमा और मौलिक अधिकार नहीं खोते।" उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि विचाराधीन और सज़ायाफ्ता, दोनों तरह के कैदियों के जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए राज्य जवाबदेह है।

वहीं, ढाका विश्वविद्यालय के अपराध विज्ञानी तौहीदुल हक ने जेलों में भीड़भाड़, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा और खराब भोजन को मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुख्य कारण बताया। उन्होंने बांग्लादेशी मीडिया 'खबरर कागोज' से कहा, "इन सभी क्षेत्रों में मानवाधिकारों के मुद्दे की अनदेखी की जा रही है।"

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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