तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की जंग: 28 अगस्त को छात्र संगठन के मंच पर आमने-सामने होंगे ममता और ऋतब्रत गुट
पश्चिम बंगाल में 'असली तृणमूल कांग्रेस' पर दावेदारी की लड़ाई अब एक नए मोर्चे पर पहुंच गई है। विधानसभा और 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली के बाद अब दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट 28 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस छात्र…
पश्चिम बंगाल में 'असली तृणमूल कांग्रेस' पर दावेदारी की लड़ाई अब एक नए मोर्चे पर पहुंच गई है। विधानसभा और 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली के बाद अब दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट 28 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) के स्थापना दिवस पर अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं। यह टकराव पार्टी के भविष्य और उसकी विरासत पर नियंत्रण को लेकर चल रहे गहरे संघर्ष का प्रतीक है।
समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, यह मुकाबला सिर्फ भीड़ जुटाने का नहीं, बल्कि पार्टी की युवा शाखा पर पकड़ बनाने का भी है, जो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में तृणमूल की राजनीतिक ज़मीन का एक अहम हिस्सा रही है। मई में हुए चुनावों के बाद पार्टी में शुरू हुआ यह विवाद अब खुलकर सामने आ चुका है, जिसमें एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का 'कालीघाट गुट' है और दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी खेमा।
शक्ति प्रदर्शन का अगला अध्याय
आगामी 28 अगस्त को दोनों गुट कोलकाता में अलग-अलग बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि किसके कार्यक्रम में ज़्यादा भीड़ जुटती है और दोनों पक्षों के नेता क्या राजनीतिक संदेश देते हैं। इससे पहले 21 जुलाई को भी शहीद दिवस के अवसर पर दोनों खेमों ने समानांतर रैलियां की थीं। ममता बनर्जी की सभा बिरला तारामंडल के पास हुई, जबकि ऋतब्रत गुट ने करीब तीन किलोमीटर दूर मेयो रोड पर अपना कार्यक्रम किया था। दोनों ही रैलियों में भारी भीड़ जुटी थी, जिससे पार्टी का विभाजन स्पष्ट रूप से दिखा।
दोनों गुटों की अपनी-अपनी ताकत
ममता बनर्जी के गुट की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और पार्टी की विरासत है, जो वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ उनके लंबे संघर्षों से बनी है। पार्टी के अहम फैसले हमेशा उनके कालीघाट स्थित आवास से लिए जाते रहे हैं, जिसके चलते यह कहावत भी मशहूर हुई कि तृणमूल में 'एक ही पद' है और बाकी सब 'लैंपपोस्ट'।
वहीं, ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के पास संस्थागत और संख्या बल की ताकत है। समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें लगभग 60 विधायकों का समर्थन हासिल है, जिसके आधार पर ऋतब्रत को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता मिल चुकी है। इस गुट को फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, अनुब्रत मंडल और जावेद खान जैसे उन नेताओं का भी समर्थन प्राप्त है, जो कभी ममता के करीबी माने जाते थे।
क्या महाराष्ट्र की राह पर बंगाल?
तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा यह संघर्ष महाराष्ट्र में हुए शिवसेना के विभाजन की याद दिलाता है, जहाँ पार्टी के असली उत्तराधिकारी का फैसला चुनाव आयोग और अदालतों को करना पड़ा था। पश्चिम बंगाल में भी 'असली तृणमूल' की पहचान का सवाल अंततः संवैधानिक संस्थाओं के ज़रिए ही तय हो सकता है। फिलहाल, दोनों गुटों की नज़रें छात्र संगठन पर अपनी पकड़ मज़बूत कर पार्टी के वैचारिक भविष्य को अपने पक्ष में करने पर हैं।
इनपुट: IANS



