गुरूवार, 23 जुलाई 2026 · नई दिल्ली
राजनीति

शिवसेना (UBT) का केंद्र पर हमला: 'बड़े कॉर्पोरेट कर्जदारों पर मेहरबानी, आम आदमी से सख्त वसूली क्यों?'

केंद्र सरकार की कॉर्पोरेट लोन राइट-ऑफ नीति पर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने तीखा हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि सरकार बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों को बचा रही है, जबकि छोटे कर्जदार, किसान…

शिवसेना (UBT) का केंद्र पर हमला: 'बड़े कॉर्पोरेट कर्जदारों पर मेहरबानी, आम आदमी से सख्त वसूली क्यों?'
(फोटो: IANS)

केंद्र सरकार की कॉर्पोरेट लोन राइट-ऑफ नीति पर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने तीखा हमला बोला है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि सरकार बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों को बचा रही है, जबकि छोटे कर्जदार, किसान और मध्यम वर्गीय लोगों से वसूली के लिए कठोर कदम उठाए जा रहे हैं। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में इस मुद्दे पर सरकार की मंशा पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

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शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा में दिए गए एक जवाब का हवाला देते हुए कहा कि वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 1,249 ऐसे खातों के कर्ज बट्टे खाते में डाले, जिनमें से प्रत्येक पर 100 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा का बकाया था। इन कर्जों की कुल रकम 7.75 लाख करोड़ रुपये थी, लेकिन इसके एवज में बैंक अब तक केवल 3.10 लाख करोड़ रुपये ही वसूल कर पाए हैं।

सरकार का तर्क और शिवसेना का पलटवार

सरकार ने संसद में बताया था कि लोन को बट्टे खाते में डालना (राइट-ऑफ) एक सामान्य तकनीकी लेखा प्रक्रिया है और इसका मतलब कर्जमाफी नहीं होता। 'सामना' के संपादकीय में सरकार के इस तर्क को "चौंकाने वाला और पाखंडपूर्ण" करार दिया गया है। पार्टी ने सवाल किया, "बड़ा लोन लेना, उसका थोड़ा सा हिस्सा चुकाना और बाकी रकम नहीं लौटाना मानो सरकारी मंजूरी के साथ हो रहा है।"

संपादकीय में मौजूदा दौर को "लोन डिफॉल्ट का अमृत काल" बताते हुए कटाक्ष किया गया है। शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि मोदी सरकार वित्तीय अनुशासन लाने का दावा करती है, फिर भी बड़े उद्योगपति इतनी बड़ी रकम चुकाने से बच जाते हैं और सरकार वसूली के बजाय उसे बट्टे खाते में डाल देती है।

गोपनीयता के नाम पर बड़े डिफॉल्टरों को बचाने का आरोप

संपादकीय में एक बड़ा मुद्दा यह भी उठाया गया कि सरकार भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 45ई का हवाला देकर बड़े कॉर्पोरेट लोन डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार कर रही है। शिवसेना (यूबीटी) ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, "छोटे लोन डिफॉल्टर्स के नाम सार्वजनिक किए जाते हैं, लेकिन बड़े उद्योगपतियों के नाम गोपनीयता का हवाला देकर क्यों छिपाए जाते हैं?"

ठाकरे गुट ने आम लोगों और कॉर्पोरेट के बीच भेदभाव का आरोप लगाया। पार्टी ने कहा कि मध्यम वर्ग, छोटे कारोबारी और किसान अगर छोटी-मोटी चूक करते हैं तो उनकी संपत्तियां, गाड़ियां और घर जब्त कर लिए जाते हैं, लेकिन हजारों करोड़ के डिफॉल्टरों पर ऐसी कार्रवाई नहीं होती। पार्टी ने आशंका जताई कि क्या यह "चंदा दो, लोन माफ कराओ" जैसी किसी अघोषित नीति का हिस्सा है, क्योंकि बड़े कर्जदार सत्ताधारी पार्टी को भारी चंदा दे सकते हैं।

इनपुट: IANS

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News4Social राजनीति डेस्क

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