पासपोर्ट धोखाधड़ी मामला: आचार्य बालकृष्ण को 15 साल बाद CBI कोर्ट से मिली राहत, सभी आरोपों से बरी
देहरादून की एक विशेष CBI अदालत ने पतंजलि योगपीठ के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण को करीब 15 साल पुराने पासपोर्ट धोखाधड़ी के एक मामले में बरी कर दिया है। सोमवार को आए इस फैसले के साथ ही 2011 में…
देहरादून की एक विशेष CBI अदालत ने पतंजलि योगपीठ के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण को करीब 15 साल पुराने पासपोर्ट धोखाधड़ी के एक मामले में बरी कर दिया है। सोमवार को आए इस फैसले के साथ ही 2011 में शुरू हुई एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत हो गया। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, बालकृष्ण पर भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल का आरोप था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
फैसले के बाद आचार्य बालकृष्ण ने इसे न्याय व्यवस्था में अपने विश्वास की जीत बताया। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, “पिछले 15 सालों से, मुझे झूठे मामले में फंसाकर और अपमान, बदनामी और मानसिक प्रताड़ना देकर अंदर से तोड़ने की नाकाम कोशिश की गई। आखिरकार, भगवान की कृपा... और आप सभी के प्यार, प्रार्थनाओं और शुभकामनाओं से, सीबीआई कोर्ट के जरिए सच की जीत हुई है।” उन्होंने इस समर्थन के लिए सभी का आभार व्यक्त किया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला अप्रैल 2011 में मिली एक शिकायत के बाद शुरू हुआ था। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने शुरुआती जांच के बाद जुलाई 2011 में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी और पासपोर्ट अधिनियम के उल्लंघन जैसी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। जांच एजेंसी का आरोप था कि बरेली के पासपोर्ट कार्यालय में जमा किए गए कुछ शैक्षणिक प्रमाण पत्र संदिग्ध थे।
जांचकर्ताओं का दावा था कि ये प्रमाण पत्र बुलंदशहर के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत कॉलेज से जारी हुए थे, जो संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध बताया गया था। हालांकि, विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड की जांच के बाद CBI ने दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए थे और 2012 में अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी।
मुकदमे का लंबा सफर
इस मामले में अक्टूबर 2013 में आरोप तय किए गए और मुकदमा कई वर्षों तक चला। जुलाई 2011 में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा करने का निर्देश दिया था। उनका पासपोर्ट लंबे समय तक अदालत में ही जमा रहा, जिसे वापस लेने और नवीनीकृत कराने की अनुमति उन्हें 2018 में उच्च न्यायालय से मिली थी।
इनपुट: IANS



