वंदे मातरम के अपमान को दंडनीय बनाने वाला विधेयक राज्यसभा में पेश, विपक्ष ने जताया कड़ा विरोध
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान कानूनी दर्जा और सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश किया है। समाचार एजेंसी IANS के…
राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान कानूनी दर्जा और सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने राज्यसभा में एक महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश किया है। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, शुक्रवार को भारी हंगामे के बीच गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 सदन के पटल पर रखा। इस विधेयक का मुख्य प्रावधान वंदे मातरम के अपमान को एक दंडनीय अपराध बनाना है।
यह विधेयक ऐसे समय में पेश किया गया जब सदन में विभिन्न मुद्दों पर हंगामा चल रहा था। हंगामे के कारण विधेयक प्रस्तुत होने के कुछ ही देर बाद राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार, 27 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दी गई। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो वंदे मातरम का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकेगी।
विधेयक पर विपक्ष का विरोध
विधेयक को पेश किए जाने पर वामपंथी दलों ने कड़ा ऐतराज जताया। उपसभापति ने सदन को सूचित किया कि उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्यों डॉ. जॉन ब्रिटास, ए. ए. रहीम, डॉ. वी. शिवदासन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सदस्य संतोष कुमार पी. की ओर से विरोध के नोटिस मिले हैं।
विरोध का नेतृत्व करते हुए सीपीएम सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने विधेयक की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया, "संसद सामान्य कानून के जरिए किसी संवैधानिक घोषणा को दोबारा नहीं लिख सकती।" ब्रिटास ने कहा कि यह विधेयक डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एक वक्तव्य पर आधारित है, लेकिन उसमें से सबसे महत्वपूर्ण वाक्य और उसके संवैधानिक संदर्भ को शामिल नहीं किया गया है।
संवैधानिक और वैचारिक तर्क
डॉ. जॉन ब्रिटास ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि डॉ. प्रसाद का वह वक्तव्य न तो संविधान का कोई प्रावधान था, न कोई प्रस्ताव और न ही संविधान सभा का निर्णय। उन्होंने कहा, "ऐसे में संसद 76 वर्ष बाद राष्ट्रपति के एक वक्तव्य को संवैधानिक दर्जा नहीं दे सकती।" उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों की गहन चर्चा के बाद जानबूझकर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को एक समान दर्जा नहीं दिया था। उनका आरोप था कि सरकार इस विधेयक के माध्यम से समाज का ध्रुवीकरण करना चाहती है और ऐसे कानूनों से देशभक्ति पैदा नहीं की जा सकती।
इनपुट: IANS



