रविवार, 2 अगस्त 2026 · नई दिल्ली
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बांग्लादेश में हिंसक कट्टरपंथ: पीएम तारिक रहमान के बयान से राष्ट्रीय बहस छिड़ी, ज़ीरो टॉलरेंस नीति पर ज़ोर

बांग्लादेश में हिंसक कट्टरपंथ और उग्रवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान द्वारा 15 जुलाई को जातीय संसद में दिए गए एक बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जिसमें…

बांग्लादेश में हिंसक कट्टरपंथ: पीएम तारिक रहमान के बयान से राष्ट्रीय बहस छिड़ी, ज़ीरो टॉलरेंस नीति पर ज़ोर
(फोटो: IANS)

बांग्लादेश में हिंसक कट्टरपंथ और उग्रवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान द्वारा 15 जुलाई को जातीय संसद में दिए गए एक बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी सरकार की "ज़ीरो टॉलरेंस" नीति को बनाए रखने का संकल्प दोहराया। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, बांग्लादेश जिस तरह से इस चुनौती से निपटता है, उसका देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ेगा।

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विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश जैसे देश के लिए, जो लगातार विदेशी निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहता है, स्थिरता केवल एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता है। चरमपंथी हिंसा और अस्थिरता का खतरा निवेशकों के भरोसे को कमजोर करता है और सुरक्षा लागत को बढ़ाता है, जिसका अंतिम बोझ आम नागरिकों, विशेषकर युवाओं पर पड़ता है।

अतीत के घाव और आर्थिक कीमत

बांग्लादेश ने कट्टरपंथी हिंसा की भारी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकाई है। इसके दो बड़े उदाहरण देश के इतिहास में दर्ज हैं। 17 अगस्त 2005 को, जमातुल मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) ने 63 जिलों में एक साथ 450 से अधिक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) विस्फोट किए थे, जिसने संगठित आतंकवाद के बड़े खतरे को उजागर किया।

इसके बाद, 1 जुलाई 2016 को ढाका के गुलशन डिप्लोमैटिक क्षेत्र में होली आर्टिसन बेकरी पर हुआ आतंकी हमला एक और बड़ा झटका था। इस हमले में 12 घंटे चली घेराबंदी के दौरान दो पुलिस अधिकारियों सहित 20 बंधक मारे गए थे, जिनमें अधिकांश विदेशी नागरिक थे। इस घटना ने बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचाया।

डिजिटल युग की नई चुनौतियाँ

आज यह चुनौती सिर्फ़ ज़मीनी स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि डिजिटल दुनिया में भी फैल गई है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल भ्रामक सूचनाएं, भड़काऊ संदेश और साज़िश संबंधी सिद्धांतों को फैलाने के लिए किया जा रहा है। इसका एक उदाहरण दिसंबर 2025 में इंकिलाब मंच के प्रवक्ता उस्मान हादी की हत्या के बाद हुई अशांति के दौरान देखा गया था। सोशल मीडिया पर भड़के गुस्से ने वास्तविक दुनिया में हिंसक विरोध प्रदर्शनों का रूप ले लिया, जिसमें एक राजनयिक मिशन, सांस्कृतिक संस्थानों और मीडिया संगठनों को भी निशाना बनाया गया।

इनपुट: IANS

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News4Social इंटरनेशनल डेस्क

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