शनिवार, 26 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
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कार्डियक अरेस्ट से लड़ाई में ड्रोन बनेंगे जीवनरक्षक? जानिए कैसे मिनटों में पहुंचा सकते हैं डिफिब्रिलेटर

अस्पताल से बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट के मामलों में अक्सर समय पर मेडिकल मदद न मिलना जानलेवा साबित होता है। हर एक मिनट की देरी से मरीज़ के बचने की संभावना लगभग 10% घट जाती है। इसी चुनौती से निपटने…

कार्डियक अरेस्ट से लड़ाई में ड्रोन बनेंगे जीवनरक्षक? जानिए कैसे मिनटों में पहुंचा सकते हैं डिफिब्रिलेटर
(फोटो: IANS)

अस्पताल से बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट के मामलों में अक्सर समय पर मेडिकल मदद न मिलना जानलेवा साबित होता है। हर एक मिनट की देरी से मरीज़ के बचने की संभावना लगभग 10% घट जाती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए अब ड्रोन तकनीक एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। समाचार एजेंसी IANS की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ड्रोन का इस्तेमाल ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (AED) को घटनास्थल तक तेज़ी से पहुंचाने के लिए किया जा सकता है, जिससे मरीज़ की जान बचाने के कीमती शुरुआती मिनट बर्बाद न हों।

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शनिवार को 'यूरोपियन इमरजेंसी मेडिसिन कांग्रेस' में प्रस्तुत किए गए इस शोध में फ्रांस के शोधकर्ताओं ने ड्रोन की क्षमताओं का विश्लेषण किया। उनका मकसद यह पता लगाना था कि एम्बुलेंस के पहुंचने से पहले मरीज़ तक डिफिब्रिलेटर कैसे पहुंचाया जा सकता है।

ड्रोन क्यों हैं ज़रूरी?

शोधकर्ताओं ने ग्रेटर पेरिस क्षेत्र में 2011 से 2024 के बीच हुए 28,349 कार्डियक अरेस्ट के मामलों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि केवल 30% मामले ही ऐसी जगहों पर हुए, जहां से स्थायी AED डिवाइस 500 मीटर के दायरे में उपलब्ध थी। सभी मामलों को इस दायरे में लाने के लिए 1,712 अतिरिक्त AED लगाने की ज़रूरत पड़ेगी, जो एक बड़ी चुनौती है।

इसके विपरीत, शोध के कंप्यूटर मॉडल से पता चला कि अगर 3.9 किलोमीटर के दायरे में काम करने वाले 100 ड्रोन बेस बनाए जाएं, तो सिर्फ़ 26 अतिरिक्त स्थायी AED की मदद से 97% से ज़्यादा मामलों को कवर किया जा सकता है। वहीं, 200 ड्रोन बेस के साथ यह कवरेज 99% तक पहुंच सकता है।

भारत के लिए क्या हैं मायने?

यह तकनीक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां कार्डियक अरेस्ट के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और कम उम्र के लोगों को भी अपना शिकार बना रहे हैं। इंडियन हार्ट एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय पुरुषों में 50% से अधिक दिल के दौरे 50 साल से कम उम्र में और 25% 40 साल से कम उम्र में आते हैं। ऐसे में ड्रोन शहरी और ग्रामीण इलाकों में, जहां ट्रैफिक या दूरी की वजह से एम्बुलेंस को पहुंचने में समय लगता है, एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

कैसे काम करेगी यह प्रणाली?

इस व्यवस्था के तहत, इमरजेंसी कॉल आते ही डिस्पैच सेंटर कार्डियक अरेस्ट की पुष्टि होने पर ड्रोन को सक्रिय कर देगा। ड्रोन एक स्वचालित उड़ान मार्ग से घटनास्थल पर पहुंचेगा और वहां मौजूद कोई भी व्यक्ति इसका इस्तेमाल कर एम्बुलेंस के आने तक मरीज़ को सीपीआर और डिफिब्रिलेशन दे सकेगा। फ्रांस के हेनरी-मोंडोर यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के प्रोफेसर मैथ्यू हेडेट ने कहा, "हमारा मकसद है कि कार्डियक अरेस्ट के मरीजों को जल्द से जल्द डिफिब्रिलेशन मिल सके।"

कुछ चुनौतियां और भविष्य की राह

हालांकि, यह अध्ययन अभी कंप्यूटर मॉडल पर आधारित है और इसे अभी 'पीयर रिव्यू' नहीं किया गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ड्रोन की लागत का आकलन भी इसकी व्यावहारिकता तय करने में अहम होगा। यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि ड्रोन एम्बुलेंस का विकल्प नहीं, बल्कि एक सहायक प्रणाली है। इसका उद्देश्य मेडिकल टीम के पहुंचने से पहले ही जीवन रक्षक प्रक्रिया शुरू करना है। स्वीडन में 2020 में हुए एक पायलट प्रोजेक्ट में ड्रोन से AED पहुंचाना संभव पाया गया था और कई बार ड्रोन एम्बुलेंस से पहले भी पहुंचे।

इनपुट: IANS

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News4Social टेक डेस्क

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