गंडक में उफान: बिहार के चंपारण में 3 किलोमीटर तक कमर भर पानी, हर साल की मुसीबत से ग्रामीण बेहाल
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के कई गांवों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। नेपाल से आए सैलाब के बाद गंडक नदी का जलस्तर बढ़ने से निचले इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया है, जिससे लोगों को…
बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के कई गांवों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। नेपाल से आए सैलाब के बाद गंडक नदी का जलस्तर बढ़ने से निचले इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया है, जिससे लोगों को रोजमर्रा के कामों के लिए भी कमर तक गहरे पानी से होकर गुजरना पड़ रहा है। यह स्थिति हर साल मानसून में बनती है, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला है।
समाचार एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार को इंडो-नेपाल सीमा पर स्थित वाल्मीकिनगर गंडक बैराज से 1 लाख 80 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया, जिसके बाद गंडक नदी उफान पर आ गई। इसका सीधा असर निचले और दियारा इलाकों पर पड़ा, जहां चकदहवा झंडू टोला, बीन टोली और कान्हा टोला जैसे गांवों में सबसे पहले बाढ़ का पानी दाखिल हुआ।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और प्रशासन पर अनदेखी का आरोप
बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों का जीवन बेहद कठिन हो गया है। एक स्थानीय निवासी ने एजेंसी को अपनी पीड़ा बताते हुए कहा, "बहुत बुरा हाल है। लोगों को आने-जाने के लिए 3 किलोमीटर तक पानी में से होकर गुजरना पड़ता है। कोई सड़क नहीं है। हमारा हाल बहुत बुरा है। न तो सरकार और न ही प्रशासन कोई कार्रवाई कर रहा है। सब बस आते हैं, देखते हैं और चले जाते हैं।"
ग्रामीणों के अनुसार, यह समस्या लगभग तीन महीने तक बनी रहती है। टूटी हुई सड़कें, बिजली की अनुपलब्धता और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी उनकी परेशानियों को और बढ़ा देती है। बच्चों की पढ़ाई ठप हो जाती है और बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
हर साल की वही कहानी, स्थायी समाधान की मांग
एक अन्य ग्रामीण ने कहा, "जब भी बरसात आती है, ऐसे ही हो जाता है। ना बिजली की सुविधा है, ना रास्ता अच्छा है। बहुत परेशानी है। कमर से ऊपर तक पानी है। हर कोई आता है, तो देखकर चला जाता है।" लोगों का कहना है कि बाढ़ के कारण बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को बहाल करने के साथ-साथ बाढ़ से बचाव के लिए स्थायी इंतजाम किए जाएं, ताकि उन्हें हर साल इस आपदा का सामना न करना पड़े।
इनपुट: IANS



