बुंदेलखंड: बेड़िया जनजाति की सच्चाई, जहाँ चंद रुपयों के लिए लड़कियों के कौमार्य को किया जाता है नीलाम

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बुंदेलखंड: बेड़िया जनजाति की सच्चाई, जहाँ चंद रुपयों के लिए लड़कियों के कौमार्य को किया जाता है नीलाम

भारत विभिन्न प्रथाओं, संस्कृतियों और रिवाजों का देश माना जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में जातियों को 3000 तथा उपजातियो को 25000 में उनके कार्यों के अनुसार विभाजित किया गया है। एक जाति समुदाय जिसे बेड़ियाजनजाति/ समुदाय के नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ इलाको में निवास करता है। जो मुख्यतः बुंदेलखंड क्षेत्र के अंतर्गत आते है। बेड़िया जनजाति पहले बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के कुछ राज्यों में पाई गयी। यह माना जाता है की ये समुदाय मोह्दिपहड़ में रहते थे तथा बेद्वंशी राजाओ के वंशज थे। ये लोग अपनी उत्पत्ति गंधर्वो से मानते है। इस जनजाति को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मांझी , शेरशाहबेड़िया, भाटिया, माल्दाहिया और बेड़िया। बेड़िया शब्द हिंदी भाषा के बाहाडा से लिया गया है। जिसका अर्थ है जंगल में रहने वाले लोग या जंगली निवासी ।

2011 जनगणना के अनुसार इनको अनुसूचित जनजाति में नामित किया गया है। इनकी जनसँख्या 46775 है। यह एक घुमक्कड जनजाति है, जिसको अपराधिक जनजाति अधिनियम के अंतर्गत अधिसूचित किया गया है।

बेड़िया जनजाति देश विदेश में अपने राइ नृत्य के कारण प्रसिद्ध है। बुन्देली लोकनृत्यों में इस जनजाति की स्त्रियों को बेड्नी भी कहा जाता है। पुराने समय में बड़े बड़े लोगों के यहाँ इस नृत्य के बिना शादियाँ या किसी भी बड़े कार्यक्रम की रस्मों को अधूरा माना जाता था। राइ नृत्य मणिपुरी में जैगोई नृत्य के भांगी पारंग से काफी सामान दिखता है। ‘राइ’ शब्द राधिका से आया है। राधिका के नृत्य से राइ नृत्य बना, जिसमे केवल राधा ही कृष्ण को रिझाने के लिए नृत्य करती है। चूंकि यह नृत्य मशाल की रोशनी में होता था और मशाल को बुझने न देने के लिए इसमें राइ डाली जाती थी इसीलिए यह राइ नृत्य कहलाया। राइ नृत्य से जुड़े कलाकार आज बदहाली का शिकार है। इनमें से बहुत से लोग ऐसे हैं जो वैश्यावृत्ति के चंगुल में फंस गए हैं।

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बुंदेलखंड क्षेत्र के रनगाँव, पथरिया, विजावत,विदिशा, रायसेन, हबला, फतेहपुर, जैसे गाँवों में यह जनजाति मुख्यतः आज भी बड़ी संख्या में निवास करती है। इस जनजाति की स्त्रियों की सच्चाई रोंगटे खड़ी कर देने वाली है। 10 से 12 साल के होते ही बेड़नी लड़कियों की ‘नथ उतराई’ की रस्म होती है, इस रस्म के तहत उनके कौमार्य की बोली लगती है यह बोली लगभग 2000 से 5000 रुपयों की होती है। नथ उतराई के बाद लड़की को गांव में एक झोपड़ी दे दी जाती है जहाँ वह देह व्यापार करती है और उसके पैसे से उसके घर वाले अपना खर्चा चलाते है। लड़की की जब शादी हो जाती है तो वह वेश्यावृत्ति छोड़ देती है। बेड़िया जनजाति के आदमी कोई काम नहीं करते हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो बेड़िया समुदाय के लोगो के घर के पालन पोषण का जिम्मा उस घर की अविवाहित स्त्रियों के कंधो पर रहता है। यही मुख्य कारण है की आज के समाज में जहाँ कन्या भ्रूण हत्या एक मुख्य समस्या बनी हुए है, वही इस समुदाय में लड़की के जन्म को एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है।