गुरूवार, 10 सितम्बर 2026 · नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश

बाराबंकी: सरयू नदी के रौद्र रूप से दहशत, कटान में समाए कई घर, प्रशासन पर लापरवाही के आरोप

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सरयू नदी के बढ़ते जलस्तर ने एक बार फिर बाढ़ और कटान का संकट गहरा दिया है, जिससे कई परिवारों के आशियाने नदी में समा गए हैं। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, नेपाल से छोड़े…

बाराबंकी: सरयू नदी के रौद्र रूप से दहशत, कटान में समाए कई घर, प्रशासन पर लापरवाही के आरोप
(फोटो: IANS)

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सरयू नदी के बढ़ते जलस्तर ने एक बार फिर बाढ़ और कटान का संकट गहरा दिया है, जिससे कई परिवारों के आशियाने नदी में समा गए हैं। समाचार एजेंसी IANS के अनुसार, नेपाल से छोड़े जा रहे पानी के कारण नदी खतरे के निशान से 49 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है, जो स्थानीय निवासियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है।

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बाढ़ का सबसे ज़्यादा असर रामनगर, सिरौलीगौसपुर और रामसनेहीघाट तहसीलों के सैकड़ों गांवों पर पड़ा है। रामनगर तहसील के हेतमापुर गांव में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, जहां नदी का तेज़ बहाव लगातार मिट्टी का कटान कर रहा है। इसके चलते किनारे बने पक्के मकान एक-एक कर नदी में ढह रहे हैं।

घर बचाने की उम्मीद छोड़ी, खुद तोड़ रहे आशियाना

हालात इतने विकट हो चुके हैं कि ग्रामीणों ने अब अपने घर बचाने की उम्मीद लगभग छोड़ दी है। ग्रामीणों के मुताबिक, अब तक 10 से 12 पक्के मकान नदी की भेंट चढ़ चुके हैं, जिससे लोगों में दहशत का माहौल है। मजबूरी में लोग खुद ही अपने घरों को तोड़कर ईंट, दरवाजे-खिड़कियां और गृहस्थी का अन्य सामान निकालने में जुटे हैं ताकि जो कुछ बच सके, उसे सुरक्षित कर सकें।

पीड़ितों का दर्द और प्रशासन पर आरोप

इन्हीं पीड़ितों में से एक श्यामू मंदिर के पास मिठाई की दुकान चलाकर अपने आठ सदस्यों के परिवार का पेट पालते हैं। उन्होंने बताया कि बाढ़ ने उनके घर और रोजी-रोटी, दोनों पर संकट खड़ा कर दिया है। एक अन्य ग्रामीण राजू ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर समय रहते बड़े पत्थरों से मजबूत बचाव कार्य किया गया होता तो शायद उनका घर बच जाता। उन्होंने कहा, "अधिकारी मौके पर आते रहे, लेकिन प्रभावी इंतजाम नहीं हो सके।" राजू ने यह भी बताया कि प्रशासन की ओर से दो वक्त का खाना तो मिल रहा है, लेकिन घर और भविष्य की चिंता उन्हें खाए जा रही है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर साल बाढ़ आती है और कटान रोकने के नाम पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन नतीजा सिफर रहता है और उन्हें अपनी जान व माल बचाने के लिए खुद ही संघर्ष करना पड़ता है।

इनपुट: IANS

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News4Social उत्तर प्रदेश डेस्क

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