सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की छूट: नए परमाणु समझौते पर अमेरिकी संसद में क्यों उठे सवाल?
अमेरिकी सरकार ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने वॉशिंगटन में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, इस समझौते के तहत सऊदी अरब को…
अमेरिकी सरकार ने सऊदी अरब के साथ एक महत्वपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसने वॉशिंगटन में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक, इस समझौते के तहत सऊदी अरब को भविष्य में यूरेनियम संवर्धन का अधिकार मिल सकता है, जिसे लेकर अमेरिकी सांसदों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों ने परमाणु हथियारों के प्रसार को लेकर गंभीर चिंता जताई है। यह समझौता अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में परमाणु रिएक्टर बनाने और आपूर्ति करने में अहम भूमिका देगा।
समझौते में कुछ सुरक्षा प्रावधान रखे गए हैं, जिनका मकसद सऊदी अरब को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है। यदि भविष्य में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी और इसकी तकनीक सऊदी अरब को नहीं सौंपी जाएगी। हालांकि, समझौते का सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि सऊदी अरब को उन कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट दी गई है जो ऐसे मामलों में अनिवार्य होते हैं। उनकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ ही निरीक्षण करेंगे।
समझौते पर सरकार और विशेषज्ञों का नज़रिया
ट्रंप प्रशासन के इस कदम का बचाव करते हुए अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा। उन्होंने दावा किया कि इसमें परमाणु सुरक्षा और अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन किया गया है। दूसरी ओर, परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ इसे एक खतरनाक मिसाल मानते हैं, जिससे अन्य देश भी इसी तरह की छूट की मांग कर सकते हैं और वैश्विक परमाणु सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। पूर्व अमेरिकी अधिकारी रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि सिर्फ एक देश (अमेरिका) द्वारा निरीक्षण पर बाकी दुनिया का भरोसा करना मुश्किल होगा।
क्षेत्रीय सुरक्षा और इजरायल की चिंता
इस समझौते ने सऊदी अरब के पड़ोसी देश इजरायल में भी चिंता बढ़ा दी है। इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे अपने देश की सुरक्षा के लिए एक 'गंभीर रणनीतिक विफलता' बताया है। उन्हें डर है कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। यह चिंता इसलिए भी अहम है क्योंकि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है तो उनका देश भी ऐसा ही करेगा।
कांग्रेस में विरोध और आर्थिक पहलू
यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है और अब इसे कांग्रेस के पास 90 दिनों की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा। कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने इसका विरोध करते हुए याद दिलाया कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से ही शुरू हुआ था। उन्होंने कहा, "हम ईरान के यूरेनियम संवर्धन का विरोध करते हैं, लेकिन सऊदी अरब को उसी दिशा में बढ़ने की अनुमति दे रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।" माना जा रहा है कि इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी कंपनी वेस्टिंग हाउस को मिल सकता है, जिसे सऊदी अरब में रिएक्टर बनाने का काम मिल सकता है।
इनपुट: IANS



