एन. रघुरामन का कॉलम:पेट्स में हीलिंग पावर होती है; हमारे साथ रहने वाले जानवर हमारे शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं h3>
वह किसी तालाब के किनारे बैठी अपने ख्यालों में डूबी थी। अचानक पानी में चार घुड़सवारों की परछाइयां दिखाई देती हैं। वह तत्काल मुड़कर उठती है और चिल्लाती है- ‘चल धन्नो!’ और घोड़ी भी तुरंत मुड़कर उसकी ओर देखती है, मानो वह अपनी मालकिन पर मंडरा रहे खतरे को समझ गई हो। उसके तांगे पर चढ़ने से पहले ही धन्नो रफ्तार पकड़ने लगती है। तांगे पर चढ़ते ही वह कहती है- ‘भाग धन्नो, आज तेरी बसंती की इज्जत का सवाल है…।’ 51 वर्ष पुरानी फिल्म ‘शोले’ का यह दृश्य अधिकांश लोगों को याद होगा। कुछ लोगों ने शायद यह भी सोचा हो कि भला कोई घोड़ी खतरे को कैसे भांप सकती है। लेकिन मुझे इस दृश्य पर कभी संदेह नहीं हुआ, क्योंकि मैंने ऐसे लेख पढ़े हैं और बुजुर्गों से ऐसी कहानियां सुनी हैं जिनमें बताया गया है कि मनुष्यों के साथ रहने वाले पशु न केवल अपने मालिक की हर बात समझ लेते हैं, बल्कि वे हमारे बढ़े हुए रक्तचाप को भी घटा सकते हैं, हमारी चिंताओं को शांत कर सकते हैं और कुछ रोगियों में जीने की इच्छा तक जगा सकते हैं। किंतु मैंने इन प्रभावों को स्वयं तब तक नहीं देखा था, जब तक कि मेरी मां की मुलाकात ‘सीसू’ से नहीं हुई। वह एक पालतू कुत्ता था, जिसे हमारे घर में आने की अनुमति प्राप्त थी। सीसू का परिचय देने से पहले मुझे यह तथ्य स्वीकारना होगा कि मैंने भी अपनी शादी में दहेज लिया था। जी हां, सीसू- जो मेरी शादी के समय आठ वर्ष का था- मेरी पत्नी के साथ ‘दहेज’ के रूप में हमारे घर आया था। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि विदाई के समय वह कार की आगे वाली सीट पर बैठा था। नवविवाहित जोड़े की आरती होने से पहले ही वह घर के भीतर चला गया था। उसने घर के हर कोने को सूंघकर देखा, फिर बाहर आकर आरती के लिए सबसे आगे बैठ गया। पहले तिलक उसी के माथे पर लगाया गया और उसके बाद नवविवाहित जोड़े के माथे पर। यह दृश्य देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हंसी से लोटपोट हो गए। मानो उसने घर का निरीक्षण कर अपनी स्वीकृति दे दी हो और मेरी पत्नी को संकेत किया हो कि यह घर उनके लिए सुरक्षित है। धीरे-धीरे हमारी रसोई की चर्चाएं भी सीसू की पसंद-नापसंद के इर्द-गिर्द घूमने लगीं। एक दिन मैंने अपनी मां को कहते सुना, सीसू को घी वाला डोसा पसंद है। जबकि यह विशेषाधिकार खुद हमें केवल रेस्तरां में ही नसीब हो पाता था। मुझे कभी जन्मदिन याद नहीं रहते थे, लेकिन एक दिन मेरी मां ने यह बताकर मुझे चौंका दिया कि उन्होंने सीसू के जन्मदिन पर 300 रुपये खर्च किए हैं। मैंने बहस करने की कोशिश की, किंतु दयालु हृदय वाली दृढ़निश्चयी मां के सामने मेरी एक न चली। जब मां व्रत रखती थीं, तब सीसू भी एक दाना तक नहीं खाता था। वह उनके साथ समीप के मंदिर तक जाता था और जब तक वे अपनी पूजा समाप्त नहीं कर लेतीं, तब तक शांति से उनकी प्रतीक्षा करता रहता था। जब कीमोथेरेपी के बाद वे तीन-चार दिनों के लिए टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती रहती थीं, तब भी उनकी सबसे बड़ी चिंता सीसू के भोजन और उसकी तबीयत को लेकर ही रहती थी। जब हम कहते, ‘वह खाना नहीं खा रहा है’, तो वे कहतीं, ‘उम्मीद है मैं सीसू से पहले नहीं मरूंगी।’ कई बार हमें लगता था कि कैंसर की अंतिम अवस्था में होने के बावजूद सीसू के कारण ही उनमें जीवित रहने की इच्छा शेष थी। एक बार डॉक्टरों ने मुझसे कहा, ‘वे दवाओं पर बेहतर प्रतिक्रिया दे रही हैं, क्योंकि वे घर लौटकर सीसू से मिलने के लिए उत्सुक हैं।’ जैसे-जैसे उनकी सेहत बिगड़ने लगी, सीसू उनका स्थायी साथी बन गया। यदि हम उसका भोजन लेकर जाते, तो वह तब तक उसे नहीं खाता था जब तक मेरी मां उसे छूकर यह न कह दें, ‘खा लो मेरे बच्चे।’ वह हर समय उनके पास रहता था, और जहां उनके पैरों में दर्द होता, वहां अपना पंजा रख देता। जब कैंसर के कारण मेरी मां की पीठ में असहनीय पीड़ा होती, तो वह स्वयं भी खाना खाने से इंकार कर देता। मां के निधन से एक वर्ष पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद जब भी मेरी मां सीसू से जुड़ी कहानियां सुनातीं, तो वे हमें मुस्कराने और हंसने पर तो मजबूर करती ही, किंतु उससे भी ज्यादा वे हमें रुला देतीं। फंडा यह है कि जब लोग कहते थे कि हमारे साथ रहने वाले जानवर हमारे शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छे होते हैं, तो मुझे कभी इसके लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ी। सीसू ने हमें पहले ही यह सिखा दिया था।
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