जगद्गुरु रामभद्राचार्य का लखनऊ में अभिनंदन, सनातन धर्म पर व्याख्यान: अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् ने किया सम्मान, वैदिक संस्कृति पर चर्चा – Lucknow News h3>
लखनऊ में अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य का अभिनंदन समारोह आयोजित किया। इस अवसर पर ‘सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति का सामंजस्य’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान भी हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संस्कृत प्रेमी, शिक्षाविद और आचर्य उपस्थित रहे। ज्ञानपीठ और पद्म विभूषण से सम्मानित जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने अपने संबोधन में सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति को देश की सबसे बड़ी धरोहर बताया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, वैदिक मूल्यों और आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ये मूल्य भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। प्रकृति की सुरक्षा मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य जगद्गुरु ने सत्य, अहिंसा, करुणा, सहिष्णुता और प्रकृति के प्रति सम्मान को सनातन धर्म के मूल सिद्धांत बताया। उन्होंने जोर दिया कि प्रकृति की सुरक्षा मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। वैदिक संस्कृति मानव जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय वैदिक संस्कृति और सनातन धर्म का सामंजस्य समाज में नैतिकता, सद्भाव और आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करता है। उनके अनुसार, वेद, उपनिषद और पुराण आज भी पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और वैश्विक शांति का संदेश देते हैं। जगद्गुरु द्वारा रचित भाष्यों की विशेषताओं पर चर्चा कार्यक्रम में जगद्गुरु के शिष्य रामचंद्राचार्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए। राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रामसेवक दुबे ने जगद्गुरु द्वारा रचित भाष्यों की विशेषताओं पर चर्चा की। विधायक नीरज बोरा ने परिषद् के पुस्तकालय और अन्य विकास कार्यों के लिए अपनी विधायक निधि से पांच लाख रुपये देने की घोषणा की। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने भी परिषद् के विकास के लिए एक लाख रुपये दान देने की घोषणा की। ये मौजूद रहे कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद् अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी ने की, जबकि संचालन प्रो. अशोक कुमार शतपथी ने किया। परिषद् मंत्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने संस्था का परिचय प्रस्तुत किया। इस समारोह में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्राध्यापक, शोधार्थी, संस्कृत विद्वान और बड़ी संख्या में संस्कृत प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन वैदिक मंगलाचरण और शांति पाठ के साथ हुआ।
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