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एन. रघुरामन का कॉलम: आर्थिक हकीकत के असर को एआई ‘कुशन’ बनकर संभाल सकता है

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एन. रघुरामन का कॉलम:  आर्थिक हकीकत के असर को एआई ‘कुशन’ बनकर संभाल सकता है

एन. रघुरामन का कॉलम: आर्थिक हकीकत के असर को एआई ‘कुशन’ बनकर संभाल सकता है

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

मुझे लगता है कि रविवार को हमारे देश की ज्यादातर मांओं ने अपने बच्चों से यही कहा होगा कि ‘इतनी परेशानी उठाने की जरूरत नहीं, सिर्फ शुभकामना ही काफी है।’ यह उन्होंने तब कहा होगा, जब बच्चे कहीं बाहर मदर्स डे सेलेब्रेट करना या कोई तोहफा खरीदना चाहते होंगे।

बच्चे सोचते हैं कि ‘मां ने मेरे लिए जो किया, उसकी तुलना किसी गिफ्ट से नहीं हो सकती।’ जबकि मांएं सोचती हैं कि ‘भावनाओं की कीमत किसी गिफ्ट से कहीं ज्यादा है।’ मदर्स डे पर अकसर कई घरों में मांओं का यही जवाब होता है- ‘पैसे खर्च करने की क्या जरूरत है?’ साल में एक बार का ऐसा सेलेब्रेशन भी जब आर्थिक हकीकत से प्रभावित होने लगे तो मैंने और दोस्तों ने इस रविवार कुछ अलग करने की ठानी।

हमने सोचा, क्यों न मांओं को खाना बनाना सिखाया जाए? मुझे पता है आप कह रहे हैं, ‘ये कैसी बकवास है?’ रुकिए, टूट मत पड़िए। आज कुकिंग क्लास में हमारा प्रयोग थोड़ा अलग था। हमने उनसे यह नहीं पूछा कि क्लास के लिए उनके दिमाग में कौन-सी ​डिश है। बल्कि हमने पूछा- ‘फ्रिज में क्या बचा है?’

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हमने उन चीजों की जानकारी एआई में डाली और रेसिपी बनाने को कहा। तयशुदा रेसिपीज में स्क्रॉलिंग के बजाय मांओं ने उपलब्ध चीजें डालीं और उन्हें एआई से तैयार निर्देश मिल गए। उन्होंने खुद ही बताया कि क्या चीजें उनके पास हैं, और क्या नहीं। एआई ने उसी हिसाब से रेसिपी में बदलाव कर दिए। पारंपरिक रेसिपी प्लेटफॉर्म सर्च आधारित होते हैं।

वे मानकर चलते हैं कि यूजर पहले ही जानता है कि क्या बनाना है। लेकिन नए सिस्टम में एआई ने इनपुट के आधार पर खुद की रेसिपी तैयार करके इस जरूरत को समाप्त कर दिया है। मांओं को यह भा गया, क्योंकि इसमें उपलब्ध चीजों का ही इस्तेमाल हो रहा था। जो चीजें अनुपयोगी रह जातीं, उनसे पूरा खाना, हल्का स्नैक या झटपट आरामदायक भोजन बन गया। एआई रेसिपी में सबसे खास यह था कि यह टूल खुद को यूजर की जरूरत के अनुसार ढाल लेता है।

मसलन, कैलोरी टारगेट्स, खानपान परहेज या पकने का समय। जैसे, कोई एआई से कह सकता है कि ‘मुझे इन चीजों से 10 मिनट में पकने वाला खाना बनाना है।’ हालांकि, एआई रेसिपीज में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। कुछ आउटपुट्स में मात्रा अस्पष्ट थी, कुछ स्टेप्स और कॉम्बिनेशन गायब थे, जिनमें बदलाव और मानवीय समझ की जरूरत थी।

लेकिन कुकिंग की बुनियादी समझ रखने वालों ने उन्हें सुधार लिया। सिस्टम ने शुरुआत बता दी, लेकिन निष्कर्ष इस पर निर्भर था कि मांओं या यूजर्स ने निर्देशों को कैसे समझा और बेहतर किया। हमें यह विचार यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा के एआई प्रोग्राम के जरिए विकसित एक काम को पढ़ने के बाद आया। इसमें दिखाया गया था कि कैसे लैंग्वेज मॉडल कुछ सेकंड में सामग्री के स्टेप्स और खाना पकाने के समय के साथ व्यवस्थित रेसिपी बना सकते हैं।

यह सिस्टम किसी पुरानी रेसिपी को ही फिर से पेश करने के बजाय बड़े डेटासेट्स से जानकारी लेकर यूजर की जरूरत के अनुसार रेसिपी बनाता है। इसमें यह भी बताया गया कि रेसिपी में न्यूट्रिशन एनालिसिस कैसे जोड़ सकते हैं, ताकि मांएं कुकिंग स्टेप्स के साथ अनुमानित न्यूट्रिशनल वैल्यू भी देख सकें।

अब मांओं को यह कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि ‘मैं पिछले 40 साल से यही खा रही हूं और मुझे कुछ नहीं हुआ।’ बल्कि वे कह सकती हैं कि ‘इस डिश के 100 ग्राम में सिर्फ 83 कैलोरी है।’ हालांकि, एआई रेसिपी की स्वीकार्यता डिश के प्रकार पर निर्भर है। जब मांएं किसी डिश को जानती थीं तो वे आत्मविश्वास से भरी दिखीं।

लेकिन जैसे ही रेसिपी ज्यादा प्रयोगात्मक हुईं तो उनका आत्मविश्वास कम हो गया। वे अपनी ही कुकिंग स्किल पर शक करने लगीं। वे अनजाने कॉम्बिनेशन पर भरोसा करने में कम इच्छुक दिखीं। लेकिन कुल मिलाकर, एआई की मदद से खाना पकाने का यह नया तोहफा न सिर्फ मजेदार था, बल्कि मांएं स्मार्टफोन के साथ सहज भी हो गईं।

फंडा यह है कि जब तक बच्चे मांओं को अपने ख्यालों में रखते हैं, तब तक उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि बच्चों का तोहफा सस्ता है या महंगा।

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