एन. रघुरामन का कॉलम: एक गलत इरादा समूचे उद्योग को बदनाम करता है h3>
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47 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
कल्पना करें, आपके रिश्तेदार अस्पताल में भर्ती हैं। डॉक्टर के दवा पर्ची लिखने के बाद आप अस्पताल के मेडिकल से दवा लेने में व्यस्त हैं। सारे बिल संभालकर रख रहे हैं, क्योंकि बाद में बीमा लाभ का दावा करना चाहते हैं। अस्पताल में हुए ब्लड टेस्ट का भी बिल रखा। डॉक्टर्स ने आपकी लाई दवाएं दी और रिश्तेदार जल्द स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हो गए। राहत की सांस लेकर आप घर लौट आए और अस्पताल खर्च की 15 हजार रु. से कम राशि के रिफंड के लिए आवेदन की तैयारी करने लगे।
आपको भरोसा है कि बीमा कंपनी से इन बिलों को मंजूरी मिल जाएगी, क्योंकि बीमा खरीदने से लेकर अब तक आपने कोई क्लेम नहीं उठाया और दावे की राशि से साढ़े चार गुना रकम का भुगतान प्रीमियम के तौर पर कर चुके हैं। पर आप हैरत में रह गए जब कंपनी ने ना सिर्फ अस्पताल खर्च का दावा खारिज कर दिया, बल्कि प्रक्रियागत दोष-संदिग्ध धोखाधड़ी का हवाला देते हुए आपकी पॉलिसी भी रद्द कर दी।
इतना ही नहीं, आपका नाम फ्रॉड अलर्ट डेटाबेस में भी दिखने लगा, जिसका मतलब है कि भविष्य में कोई बीमा कंपनी आपका बीमा नहीं करेगी और यदि किया तो आपके हर दावे को धोखाधड़ी के नजरिए से देखा जाएगा। हैरान हैं कि आखिरकार धोखाधड़ी कहां की? इसे समझने के लिए बेंगलुरु के 29 वर्षीय वीरेश राठौड़ की कहानी पढ़िए, जिन्होंने स्वयं के और बुजुर्ग माता-पिता के लिए 2022 में एक बीमा कंपनी से समूह बीमा पॉलिसी खरीदी।
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तीन वर्षों में उन्होंने कंपनी को 67 हजार 606 रु. का भुगतान किया और तब से अब तक कोई क्लेम भी नहीं लिया। अप्रैल, 2024 में उनकी मां को गंभीर गैस्ट्रोएन्टेराइटिस के उपचार के लिए स्थानीय शरभथी अस्पताल में भर्ती कराया गया। मां को अस्पताल से डिस्चार्ज कराने के बाद राठौड़ ने 14 हजार 500 रुपए का पुनर्भुगतान दावा पेश किया, जो खारिज हो गया और निम्न कारण बताते हुए उनकी पॉलिसी भी रद्द कर दी गई।
1. कंपनी ने आरोप लगाया कि बिना किसी कल्चर सेंसिटिविटी टेस्ट के ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवा (पिपटाज) दी गई।
2. राठौड़ ने कथित तौर पर 5 डोज खरीदे, जबकि तीन ही उपयोग में आए।
3. डिस्चार्ज विवरण पर चिकित्सक के प्रमाणीकरण का अभाव है।
4. ब्लड रिपोर्ट्स पर टेक्निशियन के साइन थे, पैथोलॉजिस्ट के नहीं।
अब आप बताएं कि एंटीबायोटिक्स के चयन, पहले किए जाने वाले टेस्ट, दस्तावेजीकरण में त्रुटि रहने में आपकी, मेरी या राठौड़ की क्या भूमिका है? आप उनसे ये अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे जानते होंगे कि किसी दवाई को देने से पहले टेस्ट जरूरी है? वे ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम जानते होंगे कि डिस्चार्ज विवरण कैसा दिखता है या हमें कैसे चैक करना चाहिए कि रिपोर्ट पर हस्ताक्षर टेक्निशियन के हैं या पैथोलॉजिस्ट के?
इससे भी अधिक अचंभित करने वाली बात ये है कि कंपनी ने राठौड़ की पॉलिसी रद्द कर दी और उन्हें धोखापूर्ण दावा करने वाला व्यक्ति बताते हुए इंटरनल इंडस्ट्री अलर्ट भी जारी कर दिया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और भविष्य में बीमा लेने की संभावना भी प्रभावित हुई। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण व बीमा लोकपाल में राठौड़ की अपील अनुत्तरित रही। तब उन्होंने 24 जून 2024 को उपभोक्ता मंच का दरवाजा खटखटाया।
कंपनी ने कहा कि शिकायत निराधार है और ये विसंगतियां जानबूझकर की गई हेराफेरी की ओर इशारा कर रही हैं। पर साक्ष्यों की जांच के बाद आयोग ने कंपनी के तर्क खारिज कर दिए। 16 मई को उसे आदेश किया कि वह राठौड़ को मानसिक पीड़ा के लिए एक लाख का मुआवजा, दावा खारिज करने के लिए मय ब्याज 14,500 रु., कानूनी खर्च 10 हजार रु. का भुगतान करे और दंडात्मक क्षतिपूर्ति के तौर पर उपभोक्ता कल्याण कोष में 50 हजार रु. जमा कराए। बीमाकर्ता को निर्देश दिए कि वो शेष अवधि के लिए नई बीमा पॉलिसी जारी करे और बाद में रिन्यू करे। उसे फ्रॉड अलर्ट डेटाबेस से राठौड़ का नाम भी हटाना पड़ेगा।
फंडा यह है कि किसी एक ग्राहक के साथ किसी एक प्रक्रिया में अपनाया बुरा इरादा समूची इंडस्ट्री के लिए खतरा बन सकता है। साफ इरादे रखना इंडस्ट्री के विकास में सहायक होता है।
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कल्पना करें, आपके रिश्तेदार अस्पताल में भर्ती हैं। डॉक्टर के दवा पर्ची लिखने के बाद आप अस्पताल के मेडिकल से दवा लेने में व्यस्त हैं। सारे बिल संभालकर रख रहे हैं, क्योंकि बाद में बीमा लाभ का दावा करना चाहते हैं। अस्पताल में हुए ब्लड टेस्ट का भी बिल रखा। डॉक्टर्स ने आपकी लाई दवाएं दी और रिश्तेदार जल्द स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हो गए। राहत की सांस लेकर आप घर लौट आए और अस्पताल खर्च की 15 हजार रु. से कम राशि के रिफंड के लिए आवेदन की तैयारी करने लगे।
आपको भरोसा है कि बीमा कंपनी से इन बिलों को मंजूरी मिल जाएगी, क्योंकि बीमा खरीदने से लेकर अब तक आपने कोई क्लेम नहीं उठाया और दावे की राशि से साढ़े चार गुना रकम का भुगतान प्रीमियम के तौर पर कर चुके हैं। पर आप हैरत में रह गए जब कंपनी ने ना सिर्फ अस्पताल खर्च का दावा खारिज कर दिया, बल्कि प्रक्रियागत दोष-संदिग्ध धोखाधड़ी का हवाला देते हुए आपकी पॉलिसी भी रद्द कर दी।
इतना ही नहीं, आपका नाम फ्रॉड अलर्ट डेटाबेस में भी दिखने लगा, जिसका मतलब है कि भविष्य में कोई बीमा कंपनी आपका बीमा नहीं करेगी और यदि किया तो आपके हर दावे को धोखाधड़ी के नजरिए से देखा जाएगा। हैरान हैं कि आखिरकार धोखाधड़ी कहां की? इसे समझने के लिए बेंगलुरु के 29 वर्षीय वीरेश राठौड़ की कहानी पढ़िए, जिन्होंने स्वयं के और बुजुर्ग माता-पिता के लिए 2022 में एक बीमा कंपनी से समूह बीमा पॉलिसी खरीदी।
तीन वर्षों में उन्होंने कंपनी को 67 हजार 606 रु. का भुगतान किया और तब से अब तक कोई क्लेम भी नहीं लिया। अप्रैल, 2024 में उनकी मां को गंभीर गैस्ट्रोएन्टेराइटिस के उपचार के लिए स्थानीय शरभथी अस्पताल में भर्ती कराया गया। मां को अस्पताल से डिस्चार्ज कराने के बाद राठौड़ ने 14 हजार 500 रुपए का पुनर्भुगतान दावा पेश किया, जो खारिज हो गया और निम्न कारण बताते हुए उनकी पॉलिसी भी रद्द कर दी गई।
1. कंपनी ने आरोप लगाया कि बिना किसी कल्चर सेंसिटिविटी टेस्ट के ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवा (पिपटाज) दी गई।
2. राठौड़ ने कथित तौर पर 5 डोज खरीदे, जबकि तीन ही उपयोग में आए।
3. डिस्चार्ज विवरण पर चिकित्सक के प्रमाणीकरण का अभाव है।
4. ब्लड रिपोर्ट्स पर टेक्निशियन के साइन थे, पैथोलॉजिस्ट के नहीं।
अब आप बताएं कि एंटीबायोटिक्स के चयन, पहले किए जाने वाले टेस्ट, दस्तावेजीकरण में त्रुटि रहने में आपकी, मेरी या राठौड़ की क्या भूमिका है? आप उनसे ये अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे जानते होंगे कि किसी दवाई को देने से पहले टेस्ट जरूरी है? वे ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम जानते होंगे कि डिस्चार्ज विवरण कैसा दिखता है या हमें कैसे चैक करना चाहिए कि रिपोर्ट पर हस्ताक्षर टेक्निशियन के हैं या पैथोलॉजिस्ट के?
इससे भी अधिक अचंभित करने वाली बात ये है कि कंपनी ने राठौड़ की पॉलिसी रद्द कर दी और उन्हें धोखापूर्ण दावा करने वाला व्यक्ति बताते हुए इंटरनल इंडस्ट्री अलर्ट भी जारी कर दिया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और भविष्य में बीमा लेने की संभावना भी प्रभावित हुई। बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण व बीमा लोकपाल में राठौड़ की अपील अनुत्तरित रही। तब उन्होंने 24 जून 2024 को उपभोक्ता मंच का दरवाजा खटखटाया।
कंपनी ने कहा कि शिकायत निराधार है और ये विसंगतियां जानबूझकर की गई हेराफेरी की ओर इशारा कर रही हैं। पर साक्ष्यों की जांच के बाद आयोग ने कंपनी के तर्क खारिज कर दिए। 16 मई को उसे आदेश किया कि वह राठौड़ को मानसिक पीड़ा के लिए एक लाख का मुआवजा, दावा खारिज करने के लिए मय ब्याज 14,500 रु., कानूनी खर्च 10 हजार रु. का भुगतान करे और दंडात्मक क्षतिपूर्ति के तौर पर उपभोक्ता कल्याण कोष में 50 हजार रु. जमा कराए। बीमाकर्ता को निर्देश दिए कि वो शेष अवधि के लिए नई बीमा पॉलिसी जारी करे और बाद में रिन्यू करे। उसे फ्रॉड अलर्ट डेटाबेस से राठौड़ का नाम भी हटाना पड़ेगा।
फंडा यह है कि किसी एक ग्राहक के साथ किसी एक प्रक्रिया में अपनाया बुरा इरादा समूची इंडस्ट्री के लिए खतरा बन सकता है। साफ इरादे रखना इंडस्ट्री के विकास में सहायक होता है।
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