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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: भाषा पर राजनीति करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला

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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:  भाषा पर राजनीति करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला

राजदीप सरदेसाई का कॉलम: भाषा पर राजनीति करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला

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  • Rajdeep Sardesai’s Column Nothing Will Be Gained By Doing Politics On Language

3 घंटे पहले

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राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार

‘इस देश में अंग्रेजी बोलने वाले जल्द ही शर्म महसूस करेंगे।’ -केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह‘मराठी बोलने वालों पर हिंदी थोपने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ -मनसे नेता राज ठाकरे‘हिंदी के कट्टर समर्थक संकीर्ण मानसिकता वाले और राष्ट्रविरोधी हैं, जो हमारे विरोध को देशद्रोह मानते हैं।’ -तमिलनाडु सीएम एमके स्टालिनराष्ट्रीय सुर्खियों में लैंग्वेज-वॉर की धमाकेदार वापसी हो चुकी है!

अलबत्ता भाषाई कट्टरता लंबे समय से राजनीतिक हथियार रही है, लेकिन हाल के दिनों में यह फिर सामने आई है, ताकि असल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके। अमित शाह से शुरुआत करते हैं। अंग्रेजी के प्रति शाह की नाराजगी की जड़ में संघ परिवार की हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान वाली विचारधारा है। इसमें माना जाता है कि औपनिवे​शिक भाषा होने के नाते अंग्रेजी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है।

लेकिन शाह ने अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स कॉलेज में बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई की है, जो अंग्रेजी के प्रतिष्ठित संस्थान के तौर पर मशहूर है। उनके पुत्र जय शाह भी अहमदाबाद के लोयोला हॉल में पढ़े, जो नामीगिरामी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में से एक है। और इसके बावजूद शाह ने अंग्रेजी के प्रति तिरस्कार की भावना को कभी छुपाया नहीं है।शाह की ही तरह, ठाकरे बंधुओं ने भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजा।

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उन्होंने हिंदी में बातचीत करना और साक्षात्कार देना भी नहीं छोड़ा है। फिर भी उनकी राजनीति ‘मराठी प्रथम’ के इर्द-गिर्द घूमती रहती है ताकि सियासत के भीड़भाड़ भरे बाजार में उनकी अलग पहचान बनी रहे। यदि शाह का हिंदी-केंद्रित नजरिया नेहरूवादी कांग्रेस के खिलाफ भाजपा को राष्ट्रवादी ताकत बनाए रखने के​ लिए है तो भाषा के मुद्दे पर ठाकरे बंधुओं की सियासत शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के मूल ‘धरतीपुत्र’ आंदोलन को फिर से खड़ा करने का प्रयास है।

लेकिन यह जान लीजिए कि भले ही बाल ठाकरे गैर-मराठीभाषियों के विरुद्ध बोलते रहे हों, लेकिन उन्होंने अपनी पहली नौकरी अंग्रेजी के एक अखबार में कार्टूनिस्ट के तौर पर की थी। लेकिन आज जब शिवसेना के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है तो ठाकरे बंधु भाषाई अस्मिता के नाम पर प्रासंगिक बने रहने के जतन कर रहे हैं।एमके स्टालिन भी तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी थोपने का जो मुद्दा उठा रहे हैं, वह राज्य में होने जा रहे चुनावों से पहले का एक चिर-परिचित सियासी औजार है।

दरअसल, 1960 के दशक में द्रविड़ दलों का उदय ही हिंदी विरोधी आंदोलनों के तहत हुआ था। आज छह दशक बाद जब स्टालिन नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले को तमिल बोलने वालों पर हिंदी थोपने का प्रयास बता रहे हैं तो इसके जरिए वे उत्तर-दक्षिण की जंग को फिर से सुलगाकर क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के अगुआ के तौर पर खुद की छवि मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन जहां वे ‘तमिल प्रथम’ का युद्धघोष कर रहे होते हैं, वहीं यह भी एक तथ्य है कि डीएमके चीफ के परिवार के बच्चे पढ़ने के​ लिए विदेशी विश्वविद्यालयों में जा रहे हैं।

याद रहे कि चेन्नई में अधिकतर निजी स्कूल ऐसे त्रिभाषा पाठ्यक्रम के लिए तैयार हैं, जिसमें हिंदी वैकल्पिक भाषा है।मुद्दा यह है कि समाजवादी-लोहियावादियों से लेकर हिंदुत्ववादी और क्षेत्रीय क्षत्रपों तक सभी राजनेता भले ही अंग्रेजी के खिलाफ जोर लगा लें, लेकिन ये सभी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। कम से कम आधा दर्जन कैबिनेट मंत्रियों के बच्चे तो आज प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं।

अंग्रेजी अब औपनिवेशिक भाषा नहीं रही, बल्कि आशाओं और महत्वाकांक्षाओं की भाषा बन गई है। आप देश में कहीं भी जाइए, आपको तेजी से बढ़ रहीं अंग्रेजी कोचिंग कक्षाएं दिखेंगी। ये सभी नए भारत के सामाजिक स्तर को एक पायदान ऊपर उठने का मौका दे रही हैं। अंग्रेजी बोलने में शर्माने के बजाय युवा भारतीय इसमें महारत हासिल करना चाह रहे हैं। लेकिन देश के कई हिस्सों में अंग्रेजी शिक्षण की गुणवत्ता को वांछित स्तर तक लाने के ​लिए अभी बहुत प्रयास करने होंगे।

यही कारण है कि गुजरात जैसे राज्य सेवा-क्षेत्र के मामले में पिछड़ गए हैं।यह भी रोचक है कि खुद हिंदी भी अब देश में उन्नति और उम्मीदों की भाषा बन चुकी है। एक नजर उन फिल्मों की ओर डालिए, जो बनी तो दक्षिण में थीं, लेकिन हिंदी में रिलीज होने के बाद ब्लॉकबस्टर बन गई। उत्तर-दक्षिण के बीच परंपरागत विभाजन अब कमजोर होने लगा है। भला कौन सोच सकता था कि रांची में जन्मे हिंदीभाषी महेंद्र सिंह धोनी एक दिन चेन्नई के हीरो बन जाएंगे!

  • भाषाई-युद्ध राजनीतिक तौर पर भले अस्थायी लाभ दें, लेकिन एक हद के बाद टिक नहीं सकते। भाषा की विविधता भारत की ताकत है। देश के अधिकतर युवा नौकरी की तलाश कर रहे हैं। वे भाषाई तौर पर कट्टर नहीं हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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