बिना साइलेंसर के ट्रैक्टर, टैंक समझकर डर गया पाकिस्तान: श्रीगंगानगर में सीजफायर के बाद पाकिस्तान ने दागे गोले, 2 घंटे में शान से फहराया तिरंगा – Rajasthan News h3>
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ये लक्ष्य फिल्म का संवाद है। जिसमें ओमपुरी का किरदार जंग के लिए जा रहे ऋतिक रोशन के किरदार काे ये जरूरी सलाह देता है।
इस बार भी पाकिस्तान ने ऐसा ही किया। सीजफायर का उल्लंघन किया। कई इलाकों में ड्रोन भेजे। इस बार ही नहीं 1971 की जंग में भी पाकिस्तान ने धोखे से वार किया था।
16 दिसंबर 1971 के दिन पाकिस्तान ने भारत के सामने घुटने टेके थे। उसकी फौज ने ढाका के रमना रेस कोर्स ग्राउंड पर भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था। दोनों देशों में सीजफायर भी हो गया था। सीजफायर के 10 दिन बाद पाकिस्तान ने फन उठाया और इतिहास में दर्ज हुआ बैटल ऑफ नग्गी।
पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
बैटल ऑफ नग्गी में शहादत देने वाले भारतीय सेना के 21 जांबाज।
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भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान की ये कहानी श्रीगंगानगर जिले में जीरो लाइन बॉर्डर पर बसे नग्गी गांव की है। भारत-पाक के बीच 1971 में हुए युद्ध को समाप्त हुए 10 दिन बीत चुके थे।
सीमा पर तैनात इंडियन आर्मी वापस अपने कैंपों में लौट चुकी थी। बॉर्डर पर सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन सरहद के उस पार पाकिस्तान धोखे से हमला करने की साजिश रच रहा था।
24 और 25 दिसंबर 1971 की रात अचानक बड़ी संख्या में पाकिस्तान की 36 फ्रंटियर फोर्स के सैनिक तोप, टैंक और हथियारों के साथ भारतीय सीमा में दो किलोमीटर अंदर तक घुस गए।
ट्रैक्टरों के साइलेंसर निकाले ताकि टैंक जैसी आवाज आए जल्दी ही वो नग्गी सहित दूसरे भारतीय गांवों में पहुंचने वाले थे। बॉर्डर पर पाक सैनिकों व टैंकों का भारी जमावड़ा देख नग्गी गांव के लोगों ने बिना घबराए सूझबूझ से काम लिया।
पहले उन्होंने बीएसएफ की पेट्रोलिंग पार्टी को पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की जानकारी दी। इसके बाद गांव में मौजूद ट्रैक्टरों के साइलेंसर निकाल लिए। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि बिना साइलेंसर के ट्रैक्टर भी टैंक की तरह आवाज करता था। इसके बाद तेज आवाज में ट्रैक्टर गांव में घुमाए।
गांववालों की ये तरकीब काम कर गई। पाकिस्तानी फौज ने बिना साइलेंसर के ट्रैक्टरों की आवाज को टैंक की आवाज समझा और आगे नहीं बढ़ पाए। तब तक भारतीय सेना ने आकर यहां मोर्चा संभाल लिया था।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है।
पाकिस्तान ने बिछाए थे अंडरग्राउंड माइंस भारतीय सेना की 4 बटालियन पैराशूट रेजिमेंट, 1 स्क्वाड्रन और 18 केवलरी के साथ ही 9 पैराफील्ड रेजिमेंट को दुश्मन सेना को यहां से खदेड़ने और भारतीय इलाके पर फिर से कंट्रोल हासिल करने का काम सौंपा गया था। 27 दिसंबर 1971 को भारतीय जवानों ने एक साथ पाकिस्तानी फौज पर हमला शुरू करने का फैसला कर लिया।
भारतीय सेना ने पूरी प्लानिंग के साथ 27 और 28 दिसंबर की रात में सुबह 4 बजे कंपनी कमांडर मेजर वीके बेरी की कमान में हमला बोल दिया। पाकिस्तानी फौज को हमले की आशंका थी और इसके चलते उन्होंने पहले ही इस इलाके की मजबूत किलेबंदी कर दी थी।
उन्होंने इस इलाके में जगह-जगह अंडरग्राउंड माइंस बिछा दिए थे। ऐसे में भारतीय सेना का आगे बढ़ा हर एक कदम जानलेवा साबित हो रहा था। जैसे ही भारतीय सेना के जवान यहां इन रेतीले धोरों के पास पहुंचे, उन्हें पाकिस्तान की भारी तोपों का सामना करना पड़ा।
एक तरफ मशीनगन से फायरिंग और तोप के गोले दागे जा रहे थे। दूसरी तरफ आगे बढ़ते ही अंडरग्राउंड माइंस में विस्फोट हो रहा था। बावजूद इसके भारतीय जवानों ने असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया और अपनी जमीन पर डटे रहे।
2 घंटे में पस्त हो गई पाकिस्तान फौज भारतीय सेना की 9 पैरा फील्ड रेजिमेंट ने पाक फौज के तोपखाने की बौछार का उसी भाषा में जवाब दिया। वहीं भारतीय सेना की कोर ऑफ़ इंजीनियर्स की 410 फील्ड कंपनी ने 4 पैरा के सैनिकों के साथ मिलकर एक-एक कर पाक सेना द्वारा बिछाई गई अंडरग्राउंड माइंस और दूसरी मुश्किलों को साफ किया।
भारतीय फौज के अद्भुत शौर्य और अतुलनीय पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फौज महज दो घंटों में ही पस्त हो गई। इस युद्ध में हुए भारी नुकसान के बाद पाक सैनिक पीछे भाग छूटे। अंत में 28 दिसंबर 1971 को सुबह 6 बजे भारतीय सेना ने नग्गी सैंड ड्यून पर तिरंगा लहरा दिया। हालांकि, युद्ध के दौरान भारतीय सेना के 3 अधिकारी और 4 पैरा के 17 भारतीय जवानों और 9 पैरा के एक भारतीय जवान शहीद हो गए।
विजय स्मारक परिसर में ही माता का मंदिर भी बना हुआ है।
शहीदों की याद में सेना ने बनाया विजय स्मारक इस युद्ध में शहीद हुए भारतीय रणबांकुरों की याद में भारतीय सेना ने यहां एक विजय स्मारक बनाया हुआ है। भारत पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास में ‘बैटल ऑफ नग्गी’ के नाम से दर्ज है। हर साल यहां 28 दिसम्बर को यहां आस-पास के लोग और भारतीय सेना इसे नग्गी डे के रूप में मनाती है।
माता का मंदिर भी, पुजारी बोले- ये चमत्कारी नग्गी युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बने विजय स्मारक परिसर में ही माता का मंदिर भी बना हुआ है। पुजारी मोहनलाल ने बताया कि इस मंदिर और माता की कहानी भी इसी युद्ध से जुडी हुई है। किवंदती है कि इस युद्ध में लड़ रहे भारतीय सेना के जवानों को माता ने बताया था कि आगे कहां-कहां अंडरग्राउंड माइंस बिछी है। इससे युद्ध में लड़ रहे भारतीय सेना के अफसरों और जवानों की यहां माता में अटूट आस्था हो गई थी। उन्होंने ही तब यहां छोटा सा मंदिर बना दिया था। इसके बाद ग्रामीणों और सेना के सहयोग से ये मंदिर भव्य बन गया है। यहां भारतीय सेना का इस युद्ध से जुड़ा म्यूजियम भी बना हुआ है।
पुजारी मोहनलाल ने बताया कि भारतीय सेना के अफसरों और जवानों ने ही ये मंदिर बनवाया था।
पाकिस्तान को करारा जवाब देने काे तैयार नग्गी के ग्रामीण 1971 की जंग की तरह ही इंडियन आर्मी की फिर से मदद को तैयार हैं। माता के मंदिर के पुजारी मोहनलाल ने साल 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय पाक ने गांव नग्गी में कई बम गिराए गए लेकिन यहां के लोग गांव छोड़कर नहीं भागे। सेना का सहयोग किया था। यही वजह थी कि कुछ ही देर में दुश्मनों को उनका अंजाम बता दिया गया था। पाकिस्तान फिर से अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है, ऐसे में उसको करारा जवाब देने के लिए यहां के लोग आज भी सेना का हरसंभव सहयोग करने को तैयार हैं।
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ये लक्ष्य फिल्म का संवाद है। जिसमें ओमपुरी का किरदार जंग के लिए जा रहे ऋतिक रोशन के किरदार काे ये जरूरी सलाह देता है।
इस बार भी पाकिस्तान ने ऐसा ही किया। सीजफायर का उल्लंघन किया। कई इलाकों में ड्रोन भेजे। इस बार ही नहीं 1971 की जंग में भी पाकिस्तान ने धोखे से वार किया था।
16 दिसंबर 1971 के दिन पाकिस्तान ने भारत के सामने घुटने टेके थे। उसकी फौज ने ढाका के रमना रेस कोर्स ग्राउंड पर भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था। दोनों देशों में सीजफायर भी हो गया था। सीजफायर के 10 दिन बाद पाकिस्तान ने फन उठाया और इतिहास में दर्ज हुआ बैटल ऑफ नग्गी।
पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
बैटल ऑफ नग्गी में शहादत देने वाले भारतीय सेना के 21 जांबाज।
भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान की ये कहानी श्रीगंगानगर जिले में जीरो लाइन बॉर्डर पर बसे नग्गी गांव की है। भारत-पाक के बीच 1971 में हुए युद्ध को समाप्त हुए 10 दिन बीत चुके थे।
सीमा पर तैनात इंडियन आर्मी वापस अपने कैंपों में लौट चुकी थी। बॉर्डर पर सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन सरहद के उस पार पाकिस्तान धोखे से हमला करने की साजिश रच रहा था।
24 और 25 दिसंबर 1971 की रात अचानक बड़ी संख्या में पाकिस्तान की 36 फ्रंटियर फोर्स के सैनिक तोप, टैंक और हथियारों के साथ भारतीय सीमा में दो किलोमीटर अंदर तक घुस गए।
ट्रैक्टरों के साइलेंसर निकाले ताकि टैंक जैसी आवाज आए जल्दी ही वो नग्गी सहित दूसरे भारतीय गांवों में पहुंचने वाले थे। बॉर्डर पर पाक सैनिकों व टैंकों का भारी जमावड़ा देख नग्गी गांव के लोगों ने बिना घबराए सूझबूझ से काम लिया।
पहले उन्होंने बीएसएफ की पेट्रोलिंग पार्टी को पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की जानकारी दी। इसके बाद गांव में मौजूद ट्रैक्टरों के साइलेंसर निकाल लिए। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि बिना साइलेंसर के ट्रैक्टर भी टैंक की तरह आवाज करता था। इसके बाद तेज आवाज में ट्रैक्टर गांव में घुमाए।
गांववालों की ये तरकीब काम कर गई। पाकिस्तानी फौज ने बिना साइलेंसर के ट्रैक्टरों की आवाज को टैंक की आवाज समझा और आगे नहीं बढ़ पाए। तब तक भारतीय सेना ने आकर यहां मोर्चा संभाल लिया था।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है।
पाकिस्तान ने बिछाए थे अंडरग्राउंड माइंस भारतीय सेना की 4 बटालियन पैराशूट रेजिमेंट, 1 स्क्वाड्रन और 18 केवलरी के साथ ही 9 पैराफील्ड रेजिमेंट को दुश्मन सेना को यहां से खदेड़ने और भारतीय इलाके पर फिर से कंट्रोल हासिल करने का काम सौंपा गया था। 27 दिसंबर 1971 को भारतीय जवानों ने एक साथ पाकिस्तानी फौज पर हमला शुरू करने का फैसला कर लिया।
भारतीय सेना ने पूरी प्लानिंग के साथ 27 और 28 दिसंबर की रात में सुबह 4 बजे कंपनी कमांडर मेजर वीके बेरी की कमान में हमला बोल दिया। पाकिस्तानी फौज को हमले की आशंका थी और इसके चलते उन्होंने पहले ही इस इलाके की मजबूत किलेबंदी कर दी थी।
उन्होंने इस इलाके में जगह-जगह अंडरग्राउंड माइंस बिछा दिए थे। ऐसे में भारतीय सेना का आगे बढ़ा हर एक कदम जानलेवा साबित हो रहा था। जैसे ही भारतीय सेना के जवान यहां इन रेतीले धोरों के पास पहुंचे, उन्हें पाकिस्तान की भारी तोपों का सामना करना पड़ा।
एक तरफ मशीनगन से फायरिंग और तोप के गोले दागे जा रहे थे। दूसरी तरफ आगे बढ़ते ही अंडरग्राउंड माइंस में विस्फोट हो रहा था। बावजूद इसके भारतीय जवानों ने असाधारण शौर्य का प्रदर्शन किया और अपनी जमीन पर डटे रहे।
2 घंटे में पस्त हो गई पाकिस्तान फौज भारतीय सेना की 9 पैरा फील्ड रेजिमेंट ने पाक फौज के तोपखाने की बौछार का उसी भाषा में जवाब दिया। वहीं भारतीय सेना की कोर ऑफ़ इंजीनियर्स की 410 फील्ड कंपनी ने 4 पैरा के सैनिकों के साथ मिलकर एक-एक कर पाक सेना द्वारा बिछाई गई अंडरग्राउंड माइंस और दूसरी मुश्किलों को साफ किया।
भारतीय फौज के अद्भुत शौर्य और अतुलनीय पराक्रम के आगे पाकिस्तानी फौज महज दो घंटों में ही पस्त हो गई। इस युद्ध में हुए भारी नुकसान के बाद पाक सैनिक पीछे भाग छूटे। अंत में 28 दिसंबर 1971 को सुबह 6 बजे भारतीय सेना ने नग्गी सैंड ड्यून पर तिरंगा लहरा दिया। हालांकि, युद्ध के दौरान भारतीय सेना के 3 अधिकारी और 4 पैरा के 17 भारतीय जवानों और 9 पैरा के एक भारतीय जवान शहीद हो गए।
विजय स्मारक परिसर में ही माता का मंदिर भी बना हुआ है।
शहीदों की याद में सेना ने बनाया विजय स्मारक इस युद्ध में शहीद हुए भारतीय रणबांकुरों की याद में भारतीय सेना ने यहां एक विजय स्मारक बनाया हुआ है। भारत पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज पांच सौ फीट दूर यह स्मारक आज भी उन वीरों की याद दिलाता है। यह लड़ाई भारतीय सेना के इतिहास में ‘बैटल ऑफ नग्गी’ के नाम से दर्ज है। हर साल यहां 28 दिसम्बर को यहां आस-पास के लोग और भारतीय सेना इसे नग्गी डे के रूप में मनाती है।
माता का मंदिर भी, पुजारी बोले- ये चमत्कारी नग्गी युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बने विजय स्मारक परिसर में ही माता का मंदिर भी बना हुआ है। पुजारी मोहनलाल ने बताया कि इस मंदिर और माता की कहानी भी इसी युद्ध से जुडी हुई है। किवंदती है कि इस युद्ध में लड़ रहे भारतीय सेना के जवानों को माता ने बताया था कि आगे कहां-कहां अंडरग्राउंड माइंस बिछी है। इससे युद्ध में लड़ रहे भारतीय सेना के अफसरों और जवानों की यहां माता में अटूट आस्था हो गई थी। उन्होंने ही तब यहां छोटा सा मंदिर बना दिया था। इसके बाद ग्रामीणों और सेना के सहयोग से ये मंदिर भव्य बन गया है। यहां भारतीय सेना का इस युद्ध से जुड़ा म्यूजियम भी बना हुआ है।
पुजारी मोहनलाल ने बताया कि भारतीय सेना के अफसरों और जवानों ने ही ये मंदिर बनवाया था।
पाकिस्तान को करारा जवाब देने काे तैयार नग्गी के ग्रामीण 1971 की जंग की तरह ही इंडियन आर्मी की फिर से मदद को तैयार हैं। माता के मंदिर के पुजारी मोहनलाल ने साल 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय पाक ने गांव नग्गी में कई बम गिराए गए लेकिन यहां के लोग गांव छोड़कर नहीं भागे। सेना का सहयोग किया था। यही वजह थी कि कुछ ही देर में दुश्मनों को उनका अंजाम बता दिया गया था। पाकिस्तान फिर से अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है, ऐसे में उसको करारा जवाब देने के लिए यहां के लोग आज भी सेना का हरसंभव सहयोग करने को तैयार हैं।



