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220वीं सालगिरह: कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े बयान और!

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मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान उर्फ़ ग़ालिब का जन्म आगरा के काला महल में 27 दिसम्बर 1797 को हुआ था. उनके पूर्वज ऐबक तुर्क थे. ग़ालिब जब 5 साल के थे तब उन्होंने अपने पिता को एक जंग में खो दिया. उसके बाद ग़ालिब के चाचा ने उन्हें पाला. ग़ालिब की निजी ज़िंदगी काफी उतार-चादाह्व भारी रही. जिसकी झलक उनकी शायरी और गज़क्लों में भी देखने को मिलती हके. ग़ालिब कौन थे और उनकी शायरी में एक ख़ास लहजे की वजह क्या थी. आज हम आपको बताते हैं.

  • ग़ालिब ने 11 साल की उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था. वो मुग़लिया दौर के आखरी शायर माने जाते हैं. मुगलों के आखरी शासक बहदुर शाह ज़फर 2 ने उन्हें ‘दबीर-उल-मुल्क’- और ‘नज्म-उद-दौलाह’ के खिताब से नवाज़ा था.
  • ग़ालिब ने ज़्यादातर उर्दू और फ़ारसी भाषा में लिखा. लोगो को उनकी उर्दू की रचनाएं ज़्यादा भाई. उन्हें एक इरानी अध्यापक ने फ़ारसी, अरबी और दर्शनशास्त्र पढ़ाया था.
  • ग़ालिब उनका असली नाम नहीं, उपनाम है. उन्होंने लिखने के लिए इस नाम को अपनाया था. लेकिन अपने शुरुवाती दौर में वो ‘असद’ के उपनाम से लिखते थे. पर बाद में उन्होंने ‘ग़ालिब’ का इस्तेमाल करना शुरू किया. कई जगहों पर उन्होंने ‘असदुल्लाह खान’ के नाम से भी लिखा है.
  • ग़ालिब ने बहादुर शाह ज़फर के सबसे बड़े बेटे शह्ज़ादे फखरुद्दीन मिर्ज़ा को पढ़ाया भी है. इसके अलावा वो मुग़लिया दरबार के इतिहासकार के रूप में भी काम करते थे. बाद में ने बहादुर शाह ज़फर ही उन्हें ‘मिर्ज़ा नोशा’ नाम की उपाधि से भी नवाज़ा. फिर इस तरह उनका नाम मिर्ज़ा ग़ालिब पड़ गया.

  • 13 साल की छोटी सी उम्र में नवाब इलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से ग़ालिब की शादी हो गयी. शादी के कुछ वक़्त बाद ही वो दिल्ली आकर बस गए.
  • ग़ालिब की ज़िन्दगी की सबसे बड़ी विडम्बना उनके बच्चे रहे. उन्हें सात बार पिटा बन्ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. मगर उनका कोई भी बच्चा 15 महीने से ज़्यादा ज़िंदा नही रहा. वो अक्सर अपने शेरोन में अपनी ज़िंदगी की इस कमी को बयान करते थे.

“बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे”

  • ग़ालिब ने ख़त लिखने की एक नयी कला देकर उसे और भी खूबसूरत बना दिया था. वो अक्सर ऐसे ख़त लिखते थे जैसे सामने बैठक्र बात कर रहे हो. कहा जाता है कि ग़ालिब असल ज़िन्दगी में बहुत ही मजाकिया किस्म के आदमी थे., वो अक्सर कहते थे’ ‘मैं कोशिश करता हूँ कि कोई ऐसी बात लिखूं जो पढ़ने वाला खुश हो जाए.
  • ग़ालिब सिर्फ इश्क पर ही नही इस्लाम पर भी बहुत कुछ लिखते थे. वो अक्सर पैगम्बर मोहम्मद की तारीफ़ में लिखा करते थे. लेकिन इन सबके बावाजूद उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी रमज़ान के महीने में रोज़े नही रखे. एक बार जब ग़ालिब से उनकी पहचान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा मैं आधा मुसलमान हूँ क्यूंकि मैं शराब पीता हूँ.

  • ग़ालिब को आम बहुत पसंद थे. एक बार वो आम खा रहे थे और पास खड़े गधे को आम के छिलके दे रहे थे. मगर जब गधे ने ज़मीन पर पड़े उन छिलकों को नही खाया तो उसके मालिक ने तंज़िया लहजे में कहा ‘गधे भी आम नही खाते’ जवाब में ग़ालिब ने कहा ‘गधे ही आम नही खाते’.
  • शराब के अलावा ग़ालिब को ‘भुना गोश्त’ और ‘सोहन हलवा’ भी बहुत पसंद था.
  • मुग़लिया सल्तनत में काम करने के बावजूद ग़ालिब ऐशो आराम की ज़िन्दगी बसर नही कर सके. एक वक़्त पर उनके ऊपर 40,000 रूपये का खर्चा था.
  • उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कोई किताब नही खरीदी. वो हमेशा मांगकर किताबें पढ़ते थे और ध्यान रखते थे.
  • अपने आखरी दिनों में ग़ालिब अपनी याद्दाश्त और सुनने की शक्ति खो चुके थे. उनके हाथ एकदम बेजान हो गए थे. मगर इन सबके बावजूद उनका दिमाग़ पूरी तरह चौकन्ना था.
  • आगरा में ग़ालिब के जन्मस्थल की जगह पर ‘इन्द्रभान गर्ल्स इंटर कॉलेज’ बना दिया गया है. ग़ालिब को हज़रत निज़ामुद्दीन में निज़ामुद्दीन औलिया के मज़ार के पास दफनाया गया है. वहाँ उनका भी मज़ार है.
  • 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में ग़ालिब का निधन हो गया। पुरानी दिल्ली में गली कसीम जान, बल्लीमेरान, चांदनी चौक, को ग़ालिब की हवेली के रूप में जाना जाता है. कहा जाता है वो इसी घर में रहते थे. अब उस हवेली को ‘ग़ालिब मेमोरियल’ में बदल दिया गया है और वहाँ पर ग़ालिब की याद में एक स्थायी नुमाइश लगी रहती है.

“क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ?”

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